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श्रीखंड महादेव यात्रा – दर्शन, दर्पण, अर्पण, सम्मोहन, सशक्तिकरण और समर्पण 

श्रीखंड महादेव यात्रा – दर्शन, दर्पण, अर्पण, सम्मोहन, सशक्तिकरण और समर्पण 
ShriKhand Mahadev Yatra, 2018

इंट्रो — 

 जैसा कि शायद आपको हमारे सोशल मीडिया हैंडल्स से पता चला हो कि 15 अगस्त वाले वीकेंड पर हमारा प्लान बागा सराहन और फिर वहाँ से श्री खंड महादेव जाने का बना था। नहीं पता चला तो यहां बता देते हैं कि हम वहां होकर आ चुके हैं, पर अभी वहाँ से बाहर नहीं निकल पाए हैं। जिसका कभी अंदाज़ा भी न था वैसा एक्सपीरियंस रहा; जो दिखा वो कल्पना से परे था, जो सुना वो आजतक अन-सुना था – शोर था और शान्ति भी। मॉनसून था तो पूरी वादी में बादल खेल रहे थे और प्रकृति जैसे ओस का पर्दा करे बैठी हो। कभी-कभी बस जब बादल हटते तो दूर क्षितिज दिखता वरना एहसास हवा में तो था पर नज़ारा बंद। 

अपने होमस्टे से रास्ते की ओर निकलते निकलते ही हम मिल जुलकर कुछ 13 लोग हो गए थे। कुछ लोकल थे,कुछ बाहर के घूमने वाले। कुछ लोग ऊपर भी मिले और साथ हो लिए। चलना, रुकना, बैठना, बातें, हंसी-मज़ाक, किस्से – कहानियाँ, सब हुआ साथ ही जो काम करने गए थे वो भी बख़ूबी हुआ। ट्रेवलिंग की ये भी तो एक अलग निराली बात है ना कि  आपकी बातें शुरू तो अजनबियों से होती हैं पर जब आप विदा लेते हैं तो दोस्तों से। और दोस्तों के साथ घूमने का भी मज़ा है, काम करने का भी और जिंदगी का भी।   

तो कल से आपको लेकर चल रहे हैं  श्री खंड महादेव जी की यात्रा पर – जैसी हमने की। बहुत कुछ है शेयर करने तो  लगातार छोटी- छोटी पोस्ट्स की सीरीज़ के ज़रिये स्टोरीलाइन बनाये रखेंगे ताकि आप भी साथ-साथ चलें। इंतज़ार रहेगा आपसे भी सुनने का… 

दर्शन ( पार्ट 1 )यात्रा ख़त्म हो चुकी थी, टेंट उठ चुके थे! 

तो ये है श्री खंड महादेव जी का नज़ारा सफर के आख़िरी मोड़ से – उस पॉइंट से जो सफर का सबसे अहम है। यहाँ से आप पहली बार आमने-सामने दर्शन करते हैं महादेव के उस खंड का जो सदियों से शिव की घाटी में सबसे ऊँची छोटी पर स्थिर पड़ा हुआ है।   

घाटियों, झरनों, नालों, पत्थर, पेड़, पहाड़ों, जंगल, झाड़ों से होते हुए कुछ 36 किलोमीटर चलकर आप यहां पहुंचते हैं। इसी पॉइंट पर आपकी यात्रा ख़त्म भी होती है और शुरू भी। ख़त्म इसलिए कि यहाँ पहुँचकर ही आपके सारे पूर्वाग्रह ढह से जाते हैं. मतलब कि आपको लगेगा जैसे आप यहाँ क्यों ही आए हो. मानो जो सोच लेकर आये थे वो  कहीं खो सी गई. पर फिर यही से शुरुआत होती है एक सिलसिले की. नए जवाब ढूंढने की ! मानो पहाड़ों ने अपनी  गोद में बिठाया हो और पता नहीं कहाँ से थोड़ा समय निकालकर हमें दे  दिया हो! आपके मन में चल रही उथल- पुथल एकदम शांत हो जाती है. आप ये नज़ारा देखते हैं. आपको दर्शन मिलता है…  

तो शुरू से शुरू करते हैं और कहानी की शुरुआत यहीं से रखते हैं। यहाँ से पीछे और आगे क्या-क्या रहा वो आगे की पोस्ट में जारी रखेंगे…

दर्शन ( पार्ट 2 ) – जगह एक है और नज़ारे अनेक 

कोई श्रद्धा से, कोई शौक से ,कोई सनक में या कह लीजिये पागलपन में, पर हर साल हज़ारों लोग अपने -अपने कारणों से श्रीखंड यात्रा के लिए आते हैं।  कुछ दर्शन कर पाते हैं, कुछ रह जाते हैं और  इस बार भी ठीक कुछ ऐसा ही रहा – कुछ 12 से 13 हज़ार लोग आये श्रीखण्ड जाने के लिए पर पहुँचे वाले केवल 2 ढ़ाई हज़ार। हम बहुत ख़ुश-नसीब रहे कि हमें ऊपर मौसम बेहतरीन मिला। फूल जैसी यात्रा रही और दर्शन अलौकिक!   

ट्रैक आसान तो नहीं है पर नामुमकिन भी नहीं ! परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि आपकी मानसिक और शारीरिक दोनों ही स्थितियों को चैलेंज मिलता है। रास्ता हर कदम पर आप से सवाल करता है -जैसे आपसे वहाँ आने का कारण पूछता हो, आपकी परीक्षा लेता है। पर नेचर कहीं भी कोई कसर नहीं छोड़ता आपका साथ देने में – आपका हौसला बढ़ाता है, आपको नए नज़ारे दिखाता है। आखिर में सब आप पर डिपेंड करता है की आप क्या सोच कर चलते हैं और कैसे आगे बढ़ते हैं। अगर बढ़ते रहेंगे तो पक्का पहुँचेंगे।  

तो निकलने से पहले हमको भी कोई आइडिया नहीं था कि क्या होगा, कैसे होगा, पहुँचेंगे या नहीं। पर जब आप ऊपर पहुंचते हैं तो पता लगता है की कुछ भी मायने नहीं रखता सिवाए इसके की आपको मुश्किलों को गिनने की बजाय बस चलते रहना है। 

वहाँ पहुँचकर यही हमने जाना और शायद यही हमारा ‘दर्शन’ रहा। 

आगे बताएँगे की कब और कैसे चले… 

 दर्पण ( पार्ट 1 ) रास्ता, रास्ता है चलने के लिए 

श्रीखंड महादेव की यात्रा कहने के लिए जौं से शुरू हो जाती है क्योंकि वहां रोड ख़त्म हो जाता है और वहाँ से फिर आपको 4 किलोमीटर पैदल चलना होता है सिंहगाड़ तक जो की आखिरी गांव है। उससे कुछ 3 किलोमीटर आगे है  बरहाटी नाला – जो कुरपन खड (धारा) के किनारे पर बसा एक छोटा सा ठिकाना है जो सबसे आखिरी पॉइंट है जहां आपको लाइट की सुविधा मिलेगी।

और इसके बाद यहीं से शुरू होती है आपकी असली यात्रा – आप चढ़ाई शुरू करते हैं। जैसे-जैसे आप कुरपन खड (धारा) को नीचे छोड़ते हुए ऊपर चढ़ते हैं, जंगल गहरा और ज्यादा शांत होता जाता है। पेड़-पौधे आपको घेर लेते हैं, मोबाइल नेटवर्क गुल और सारी दुनिया पीछे रह जाती है। 

पहला दिन हमने बिताया अपने बागा सराहन  वाले होम स्टे पर और बागा के ग्राउंड में अच्छे से सुस्ताये, पूरे दिन मस्ती मारी और इंतज़ार किया। इंतज़ार किसका ?   

जैसा की आप जानते हैं कि आप में से ही कुछ और दोस्तों का साथ आने का प्लान था जो कि कारणवश नहीं पूरा हो पाया। पर कोई नहीं, इस बार नहीं तो अगली बार सही ! 

तो प्लान के हिसाब से हमने तय किया कि अगले दिन दोपहर तक आने वाले लोगों का इंतज़ार करते हैं और उसके बाद हम निकल लेंगे। जाने के लिए सारी तैयारियाँ हो चुकी थी, सामान रेड्डी था और साथ में दत्ता, गगन, प्रदीप और देवेन्द्र भाई जी भी।   

अगले एपिसोड में आपकी मुलाक़ात कराते हैं कुछ और नए लोगों से, जो साथ चले… 

 दर्पण ( पार्ट 2  ) खुद ही को हम सभी में देखें 

हिंदी भाषा में वो कहावत है ना ‘जैसे को तैसा’ – जैसे आप खुद होते हैं आपको अपनी वैसे ही परछाई दूसरों में देखने को मिलती है- चाहे दोस्तों की बात कीजिये या अनजानों की। और कॉलरिज साहब ने भी यही बात कही है नेचर को लेकर भी  कि नेचर भी आपको वैसा दिखता है जैसा आप खुद फील कर रहे होते हैं – आप दुखी हैं तो सारा संसार आपको दुखी लगता है और अगर खुश हैं तो सब मुस्कुराता हुआ। अब  इस चीज़ को आप कहीं भी लागू कर के देख सकते हैं, श्रीखण्ड महादेव ट्रैक पर भी। जिस सहूलियत में आपने अपने शरीर और दिमाग को रखा होता है, ट्रैक भी बिलकुल वैसा ही नज़र आता है  – एकदम शीशे जैसा आपको आपकी तस्वीर दिखाता हुआ। 

इसी बात को आप लागू करके देखिये दोस्ती में, जैसे आप ख़ुद होते हैं आपको वैसे ही दोस्त भी मिलते हैं।  आपको और अगर कुछ दोस्त साथ चल रहे हों तो सफर भी कट जाता है बातों- बातों  में और जिंदगी भी।  

अपने को भी कुछ नए दोस्त मिले इस यात्रा पर जो साथ में चले – निरमंड से दत्ता भाई जी जो हमारे गेस्ट को निरमंड में रिसीव करते हैं और खुद बी.एड और इकोनॉमिक्स में मास्टर्स किये हुए हैं। टीचर रहे हैं और खासी जानकारी रखते हैं अपने गाँव निरमंड – जो की हिमाचल का सबसे बड़ा और सबसे पुराना गाँव है। 

दत्ता भाई जी ने हमारी मुलाक़ात करवाई बाबा सौरव गिरि जी से जो की बरहाटी नाला पर रहते हैं, जिसको लंगर स्थान भी कहा जाता। ऐसा इसलिए क्यूंकि सावन में यात्रा के दौरान यात्रियों को रहने और खाने की निःशुल्क सेवा दी  जाती है। 

तो बाबा जी का भी प्लान बन गया अपने साथ चलने का।  और ऐसे जुड़ते- जुड़ते हम भी काफी लोग हो गए… 

इसके अलावा देवेंद्र, गगन और प्रदीप भाई जी भी साथ थे जो कि ट्रैकिंग एक्सपर्ट्स हैं और सालों से हिमालय की चोटियों पर घूम रहे हैं और ना जाने कितनी बार श्रीखण्ड की यात्रा कर चुके हैं।  

तो सभी साथ थे और तैयार श्रीखण्ड के लिए..

3 – अर्पण (पार्ट – 1)   — 

तो अपने बागा सराहन वाले होम स्टे से हम लोग दोपहर 2 बजे निकले और रास्ते भर बारिश में भीगते-भीगते करीब 10 बजे पहुंचे  बरहाटी नाला – बाबा जी के अड्डे पर। कुछ 12  किलोमीटर चले, रास्ता इतना मुश्किल नहीं था पर लगातार हो रही बारिश ने उसको मुश्किल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। रास्ते में कीचड़ और पत्थरों पर काई जमी थी, तो फिसलने के पूरे-पुरे चांस लगातार बने हुए थे।  रेन-कोट पहने हुए थे पर हवा में इतनी नमी थी कि बैग, बैग में सामान,जूते-कपड़े सब भीग चुके थे। रात हो गयी थी और थोड़ी ठंड भी। पहुंचे तो पास चूल्हे में आग जल रही थी, फटाफट जाकर नज़दीक बैठ गए और कपड़े – लत्ते भी बैग से निकालकर आसपास फ़ैला दिए।  

अब अगली सुबह निकलना था काली घाटी के लिए जो कि श्रीखण्ड महादेव यात्रा का दूसरा पड़ाव है, बरहाटी नाला से करीब 8 किलोमीटर। बीच में थाचरू भी पॉइंट हैं, पर हम को सीधा जाना था काली जाती टॉप, जहां रुकने का सीन था।    

बारिश अभी भी तेज हो रही थी तो आग के पास से हटने का मतलब ही नहीं बन रहा था।  

बाकी कुछ लोग बाबा जी के साथ अंदर रूम में बैठे हुए थे,जहां पूजा स्थल है। बातें चल रही थी, साथ में चाय और चिल्लम। कुछ लोग किचन में सबके लिए खाना तैयार करने में लगे हुए थे और बाक़ी अगले दिन की तैयारी में सामान पैक कर रहे थे – तो इनमें से काफी ऐसे लोग हैं जो हर साल यात्रा के समय यहां आते हैं, दस – पंद्रह दिन रुकते हैं और आने वाले यात्रीओं के लिए खाना बनाते हैं, खिलाते हैं, उनके रुकने के साथ-साथ, गरम पानी तक का इंतज़ाम करते हैं। फिर यात्रा ख़त्म होने के बाद सौरव गिरी बाबा जी के साथ जाकर दर्शन करते हैं श्रीखण्ड महादेव जी के। मज़ेदार लोग थे ।    

रात, बारिश, बातें, आग और आसपास कुछ बेहतरीन लोग – मतलब गज़ब ही माहौल बना हुआ था। पर अगले दिन चढ़ना था तो कुछ देर आग के आगे सिक कर हमने फ़टाफ़ट खाना- पीना खाया और बिस्तर पकड़ लिए। 

सुबह होश आया तो पाया कि नज़ारा अभी भी वही है। जैसी खड़ी बारिश रात में हो रही थी अब भी वही सीन था। रत्ती भर भी कम नहीं हुई थी और रुकने के कोई आसार भी नहीं दिख रहे थे। फिर क्या था, बस बारिश रुकने का इंतज़ार और आग के सामने बैठकर इधर-उधर के क़िस्से,। 

आगे बढ़ेंगे, बारिश रुकने के बाद… 

अर्पण (पार्ट – 2 ) – आपके कदम आसमान देखते हैं… 

दोपहर 2 बजे करीब बारिश मंदी हुई तो हम आगे बढ़े। अब पहुँचना था काली घाटी टॉप पर जो कि कुछ 8 किलोमीटर है बरहाटी से। शुरुआत के 5 किलोमीटर सिर्फ घना जंगल है और आखिरी के 3 किलोमीटर जड़ी-बूटियों से लदे हुए पहाड़। पुरे रास्ते आपके कदम सिर्फ आसमान की ओर देखते हुए आगे बढ़ते हैं, ढलान का नामो-निशान नहीं मिलता। 

खाने-पीने का सामान था और बाक़ी लोग भी थोड़ा आगे-पीछे पर साथ ही चल रहे थे। पहले कुरपन खड, जो कि अब तक हमारे दाएं और बह रही थी उसको पार किया और फिर जंगल से होते हुए चढ़ना शुरू किया।
चलते-चलते शाम हो चली थी। बारिश अब रुक चुकी थी, बादल छंटे तो एकदम साफ़ नीला आसमान दिखा, नीचे पूरी घाटी नज़र आ रही थी और जहां से चल कर आ रहे थे वह जगह भी। सन-सेट जबर था पर क्यूंकि अभी तक आधा रास्ता भी पार नहीं हुआ था तो तिरछी नज़रों से ढलते सूरज को देखते हुए हम आगे बढ़ते रहे।  

थाचरू तक पहुंचे तो सूरज छुप चुका था और अंधेरा होने लगा था। हमे सबसे पहले अब जंगल पार करना था तो टोर्च जलाकर हम धीरे- धीरे चढ़ते रहे। कुछ रात 8 बजे तक हमने जंगल पार किया तो इलाक़ा बदला – ट्रेक मिट्टी की जगह पत्थर का हो चुका था, पेड़ ख़तम हो गए थे और चारों तरफ सिर्फ झाड़ियाँ थी। 

और अब हमें चढ़ना था यात्रा का सबसे मुश्किल पार्ट जिसको कहते हैं – डंडा धार। ये काली घाटी तक पहुंचने के आख़िरी 3 किलोमीटर हैं पर एकदम खड़े। 70 डिग्री से ज्यादा की खड़ी चढ़ाई मिलती है और ट्रेक का रास्ता एकदम भुर-भुरा मतलब कि आप फिसले तो सीधा नीचे। यह भी हमारा लक ही कहिए कि अंधेरा हो गया था और हमको ये चढ़ाई नहीं दिख रही थी। टॉर्च की रोशनी में सिर्फ आगे के दो कदम दिख रहे थे और हम सर नीचे करके चले जा रहे थे।  

डंडा धार चढ़ने से पहले हमने एक स्टॉप और लिया। थके हुए थे तो पत्थरों पर ही फैल गए। कुछ पल बैठे ही तारों की ओर ही नज़रें करके कि सामने पहाड़ की छोटी से पीछे से निकलता है चाँद। पल में सारी थकान ग़ायब। तारों की एक चादर अगर आसमान में टंगी थी तो ऐसी ही सितारों की एक चादर पहाड़ों में फैली हुई दिख रही थी – वैली का हर एक घर एक तारे की तरह ही चमक रहा था। 

आगे चले तो सीधा टेंट में ही रुके – क़रीब १० बजे। खा पीकर अपने बिस्तर में सेट हो गए। बाहर का नज़ारा क्या है, कैसा है, इसका हमें कोई अंदाज़ा नहीं था। यही सोचते-सोचते फिर हम सो गए…
आगे की कहानी सुबह। 
P.S – सभी फोटो वापस आते समय खींची गई हैं।  

 श्रीखंड महादेव यात्रा – (पार्ट – 7 )

सम्मोहन (पार्ट – 1) और आप मोह लिए जाते हैं…  

अब तक क्या हुआ : बागा सराहन से नज़ारे चख कर श्रीखण्ड महादेव के लिए निकलना। फिर पहले बेस कैंप (बरहाटी नाला) तक का सफर – सफर की शुरुआत, बारिश, भीगते हुए पहुँचना, और रात भर बारिश रुकने का इंतज़ार। अगली दोपहर बारिश रुकने पर बरहाटी से दूसरे कैंप (काली घाटी) तक पहुंचने का एडवेंचर – चढ़ाई जंगल, अंधेरा और अंधेरे में रुकते-रुकते चलना। काफी कुछ घट चुका था, काली घाटी तक पहुंचते- पहुंचते। अब उससे आगे का सफर… 

तो काली घाटी पर सुबह जब आँख खुली और बाहर निकले तो पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया। धुंध और पगलाए हुए बादलों के अलावा कुछ और दिख ही नहीं दिख रहा था। सब ओझल था – आसपास के पेड़- पौधे, पहाड़, आसमान, सूरज, चिड़ियाँ और बाक़ी कुछ भी धुंध और बादलों में गायब हो रखे थे; हमें पता था कि सब आसपास ही हैं पर खुली आँखों से देख पाना मुश्किल था। धरती ने धुंध की चादर ओढ़ रखी थी और नेचर का ज़र्रा- ज़र्रा खुद को  सबकी नज़रों से छुपाए बैठा था। यकीन कर पाना मुश्किल था कि प्रकृति ऐसे भी खेलती है – शायद यही सम्मोहन था।   

सर रबीन्द्रनाथ की एक कविता की एक लाइन सामने आ गई थी जिसमें उन्होंने ऐसे ही लिखा है कि  – “धुंध, मानो धरती की चाहत सी है, वह धरती को सूर्य से अलग करती है, जिसके लिए धरती हमेशा मरती है।”  गज़ब का समां था जो नशे की तरह चढ़ता ही जा रहा था। 

हमने पूरा आनंद लिया; आराम से बैठे और काफ़ी देर ताक़तें रहे आते जाते बादलों और धुंध को आपस में एक होते हुए। पिछले दिन की ज़बरदस्त चढाई के बाद और भी ज्यादा स्वाद आ रहा था। अगला स्टॉप अब पार्वती बगीचा था जो की काली घाटी से कुछ 12 किलोमीटर है। आगे का रास्ता पिछले के मुकाबले बहुत बेहतर है तो अब चलने में मज़ा आने वाला था। कुछ जगहों पर चढ़ाई को छोड़कर वहाँ से आगे का रास्ता ज़िग- ज़ैग की तरह है – ऊपर जाता है नीचे आता है और फिर ऊपर, फिर नीचे और ऐसे ही चलता जाता है। काफी छोटे- बड़े झरने मिलते हैं रास्ते में।  

ट्रैकिंग के लिए बेहतरीन मौसम था तो कुछ देर बैठने के बाद हमने फटाफट अपना नाश्ता किया और निकल लिए पार्वती बगीचे लिए।     

श्रीखंड महादेव यात्रा – (पार्ट – 8 )

सम्मोहन (पार्ट – 2 ) पहाड़ों में मॉनसून जादू है, सम्मोहन का…   

मानसून में ट्रैकिंग करना थोड़ा मुश्किल और खतरनाक हो सकता है, पर मज़ेदार बहुत होता है! आपको लाइफ दिखती है –  एकदम ग्रीन और फ्रेश, हर एक पत्ता ऐसा दिखता है जैसे कि बस अभी उगा हो और पूरी मस्ती में जी रहा हो। पत्तों पर जमी ओस की बूँदें उनमे ताज़गी भर रही होती है और बदले में ये पत्ते हवा में ख़ुशी बिखेर रहे होते हैं. हर दस- बीस कदम पर आपको कहीं न कहीं से पानी रिसता हुआ मिल जाएगा – पिएंगे तो कहेंगे कि अमृत तो नहीं है पर उससे कम भी नहीं। चारों और बादलों का बाज़ार लगा होता है। ऊंचाई से गिरते झरने, हवा में इंद्रधनुष बना रहे होते हैं। दुनिया सिंपल और रंगीन, पर दोनों एक साथ दिखती है।

काली घाटी से निकलते ही, कुछ 1 किलोमीटर सीधा नीचे उतरना होता है। और फिर बस चलते जाओ नालों को पार करते हुए। रास्ते में भीम तलाई आता है जो रुकने का एक और अड्डा है. पर यह अड्डा सिर्फ यात्रा के समय ही चालू रहता है। रास्ते में एक दो जगहों पर आपको इक्का-दुक्का टैंट दिखने को मिल सकते हैं पर ये मैन स्टॉप नहीं होते। फ़िर एक आता है भीम द्वारी जिसको आप पार्वती बगीचे का एंट्री पॉइंट भी कह सकते हैं। यहां आपकी  मुलाक़ात होती है फेमस पारवती झरने और उससे निकलते नाले से जिसको बारिश के समय पार करना बेहद ख़तरनाक होता है। बारिश के समय पानी भरता है तो फिर बस यह नाला बोलता है; आपकी यात्रा यहीं ख़त्म करवा सकता है!

तो बारिश होने से पहले नाले को पार करने के चक्कर में हम थोड़ा जल्दी चल रहे थे और रास्ता थोड़ा आसान था। सुबह मौसम भी मज़ेदार हो रखा था। सूरज कुछ ऊपर चढ़ा तो मौसम थोड़ा साफ़ हुआ – बादल छंटे और आसपास के पहाड़ और वैली नज़र आई। पर पहाड़ों में मौसम बदलते समय नहीं लगता और ख़ासकर 2 बजे के बाद तो पक्का है।

पार्वती नाले के बाद, बगीचे तक पहुँचने से पहले कुछ एक डेढ़ किलोमीटर की खड़ी चढाई आती है. पर वो आप धीरे-धीरे, आराम से पार कर सकते हैं। और फ़िर अगला टॉप होता है पार्वती बगीचा – यात्रा का आख़िरी बेस कैंप।

श्रीखंड महादेव यात्रा – (पार्ट – 9  )

सशक्तिकरण -1  आप सीखना चाहें तो सिखाती है, प्रकृति, आपको बनाती है।

 दोपहर के करीब 3 बजे हम पहुँच गए पार्वती बगीचा – सफर का आख़िरी बेस कैंप। टेंट तैयार था और खाना भी। हमने पहले अपना सामान टेंट में सेट किया और फिर खा-पीकर खुद को। अब हमारे पास काफी समय था; आराम करने का, सोने का, बातें और बकचोदी करने का। 

दिल्ली के दो भाई और मिल गए जो उसी टेंट में रुके हुए थे। उनको भी अगले दिन श्रीखंड महादेव के लिए चढ़ना था, साथ बैठे बातें मारते-मारते साथ निकलने का प्लान बन गया।  

कुछ देर टेंट में पड़े रहने के बाद शाम सी हुई तो बाहर निकले। बाहर निकल कर बैठे और जब बैठे तो समझ आया की आख़िर क्यों पार्वती जी ने कभी इस जगह को अपना बगीचा रखा होगा। पूरी वाले नीचे घास का कारपेट लग रही थी जो रंग बिरंगे फूलों से सजाई गई हो। चारों और से आती झरनों और नालों के पानी की आवाज़ें और हवा में घुली हुई थी उनके मीठे पानी की मिठास। यही सब था वहां की हवा में जो मंत्रमुग्ध कर रहा था। बैठे- बैठे सोच रहे थे कि बादल छंटे तो सन-सेट का नज़ारा दिखे पर जो अभी तक पूरी यात्रा पर नहीं हुआ था तो बादल भला अब कैसे होने देते। बादलों ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा कहीं भी। 

ऐसी शांति थी जो अंदर से भर दे ख़ालीपन को। और ऐसी ही शांति में मन में वे ख़याल आते है जिन्हे फिर से जी कर आप समझते हैं महत्व – काम का, लोगों का, बातों का, रिश्तों का और अपना।  

हम भी पड़े-पड़े ख्यालों में खोए  हुए थे अब तो। नज़रें नीचे वैली की ओर पड़ी तो फिर यही सोच आयी की जब इतना चल कर आ गए हैं तो आगे भी ज़रुर चल ही लेंगे। और ये बात शायद हम खुद से नहीं बल्कि खुद प्रकृति हमसे कह रही थी। फिर हमारी ऐसी ही बातों की बीच मुस्कुराए देती है प्रकृति सारी और उसके साथ हम भी। 

रात हो गयी थी, मौसम साफ़ था और पूरा आसमान अब टिमटिमाते तारों से भरा था। अगले दिन जल्दी निकलने बना पर हुआ क्या वो अगली पोस्ट में देखते हैं…  

श्रीखंड महादेव यात्रा – (पार्ट – 10  )

सशक्तिकरण -2  सूर्योदय अपने रस्ते था और हम अपने…

पार्वती बगीचे से श्रीखंड महादेव चोटी कुछ 6 से 7 किलोमीटर है। बीच में ना तो कोई रुकने की जगह है और ना ही पीने के पानी का कोई जुगाड़। आप अपना खाना- पीना खुद लेकर चलते हैं। पर चलने का असली मज़ा अब आता है, ख़ासकर ट्रैक के आख़िर हिस्सा में  जो कि रोमांचक, खतरनाक और प्योर एडवेंचर है। चैलेंज बस ये होता है कि श्रीखंड टॉप तक जाकर आपको उसी दिन वापस भी आना होता है। सुबह जितना जल्दी निकल सकें उतना बेहतर। 

शाम तक और लोग भी पार्वती बगीचे पहुँच चुके थे। प्लान ये बना कि जल्दी सो कर आधी रात में निकला जाए ताकि सूर्योदय टॉप से देख पाएं। किया ये ही गया। 

रात 1 बजे टेंट में हलचल थी आँख खुली तो देखा कुछ लोग पहले से जगे हुए थे। पर सब शांत बैठे थे – भोले की आराधना चल रही थी, बाहर निकलने के आसार शुन्य थे क्यूंकि मूसलाधार बारिश का अंदाज़ा टेंट पर पड़ती बूंदों से ही पता लग रहा था। प्लान में बदलाव हुआ – अब सुबह जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी निकलने पर बात आयी। वैसे फिर वापस नींद नहीं आती पर कम्बल का कोज़ीनेस और बारिश की बूंदो की टप-तप, हम कुछ देर में फिर चित्त हो गए।   

3:30 बजे क़रीब आँख खुली तो सब शांत था। फ़टाफ़ट बाहर निकले और फ्रेश-व्रेश होकर तैयार हो गए। 

बाहर चाँद की मद्धम सी रोशनी नीचे वैली पर फैले सफ़ेद बादलों की चादर पर पड़ रही थी जो ख़ुशी में चमक उठे थे। दूर कहीं बादलों में बिजली हर सेकंड दो सेकंड पर लगातार चमक रही थी। नीचे कहीं बारिश हो रही थी पर ऊपर मौसम साफ़ हो चूका था तो हम फटफट देर किया बिना 4 बजे तक निकल लिए। 

रात की रौशनी में पत्थरों, नालों और सोते हुए फूलों के बीच से कूदते-फांदते हम आगे बढ़ रहे थे। नयन सरोवर से कुछ दूर ही थे की आँखों को रौशनी में नयापन सा लगा। सूर्योदय अपने रस्ते था और हम अपने।  

नज़ारा कुछ ऐसा हुआ: बादल तो नीचे रह चुके थे, सूरज कहीं पहाड़ों के पीछे से जग रहा था। फिर दूर कहीं सुबह की पहली रौशनी दिखी बादलों में जो धीरे-धीरे बादलों को ख़ुशी से लाल करती हुई हमारी तरफ बढ़ी रही थी – सुबह हो रही थी। पहाड़ों की चोटियों पर रौशनी पड़ी तो उनकी भी आँख खुली। हवा सर्द थी पर उसमे सुबह की ताज़गी  ख़ुशबू बनकर दौड़ रही थी जो हमको मदहोश कर रही थी। सुबह की इसी मदहोशी में हम नयन सरोवर पहुंचे।     

आगे अगली पोस्ट में… 

श्रीखंड महादेव यात्रा – (पार्ट – 11  )

समर्पण – 1 रास्ता  मुश्किल भी आसान भी 

श्री खंड ट्रेक की एक मज़ेदार बात यह है कि आपको चलने का रास्ता ढूंढने की जरुरत नहीं पड़ती; रास्ता खुद आपकी राह देखता है,आपको बस चलते रहना होता है। सफर की शुरुआत से लेकर ऊपर चोटी तक आपको पेड़ों और पत्थरों पर लाल और पीले रंग के निशान दिखते है जो सही दिशा में चलने के लिए आपको गाइड करते हैं। इन निशानों को सही से फॉलो करके आप  बिना रास्ता भटके ऊपर पहुँच सकते हैं। 

हमारा अब तक का सफर काफी सही रहा था; रास्ता- वास्ता तो नहीं भटके थे कहीं। पार्वती बगीचे से नयन सरोवर तक भी ऐसा होने का मतलब तो नहीं बनता था पर यहां हम थोड़ा अटक गए – सुबह की कम रौशनी में पत्थरों के बीच निशान ढूंढते हुए हम धीरे- धीरे चल तो रहे थे पर एक पॉइंट पर आकर निशान गायब हो गए। रात को बारिश की वजह से जगह-जगह लैंड स्लाइड हुए थे जिससे निशान वाले पत्थर नीचे दब गए और रास्ता गायब हो गया था। जिस तरफ हमको बढ़ना था वो दिशा तो हमको पता थी पर चलना कहाँ से है वो नहीं समझ आ रहा था। थोड़ा ऊपर- नीचे, दाएं- बाएं होते हुए हम बड़े- बड़े बोल्डर् पर से चढ़ते-उतरते पहुँच तो गए नयन सरोवर, बस थोड़ा टाइम लग गया।  

सुबह हो गयी थी और हम नयन सरोवर पर थे। यहां से अब रास्ता लेफ्ट लेता है। आप सरोवर से खड़े होकर जब निशानों को फॉलो करते हुए अपनी मुंडी घुमाते हैं तो रास्ता आपको ऊपर की ओर जाता दिखाई देता हैं। आपके ठीक सामने एक ऊँची पहाड़ी दिखती है जिस पर आपको चढ़ना होता है। ये सोच कर एक बार तो फटती है और  ऊंचाई देखकर मन कहता है कि शायद यही आख़री चढ़ाई है, ये चढ़कर शायद श्रीखण्ड महादेव दिख जाएं। पर ऐसा होता नहीं।  

चोटी तक का रास्ता मुश्किल से 2 किलोमीटर भी नहीं होगा पर ये रास्ता आपकी परीक्षा लेता है। ट्रेक के नाम पर बस बड़े- बड़े बोल्डर फैले दिखते हैं। आगे चलना चैलेंजिंग और खतरनाक होता है। पर ट्रैकिंग का एक ही मूल- मंत्र है – रुक रूककर ही सही पर बस चलते रहना और अगर आप इसे फॉलो करें तो टॉप भी आ जाता है।    

टॉप से नज़ारा अलोकिक है – आपको दोनों साइड वैली दिखती हैं और उन पर बादलों की मख़मली रज़ाई। बर्फीली हवा के थपेड़े आपका स्वागत करते है। हवा में ऑक्सीजन कम हो जाती है तो सांस लेने में थोड़ी कठिनाई हो सकती है। पर यहां कुछ देर रूककर नज़ारे का लुत्फ़ लेना तो बनता है।   

इससे आगे श्री खंड पहुंचने के लिए 7 छोटी- छोटी पहाड़ियां और पार करनी होती हैं जो आगे पोस्ट में जारी रखेंगे 

श्रीखंड महादेव यात्रा – (पार्ट – 12 )

समर्पण – 2  जहाँ से चीज़ें समझ आने लगें, शुरुआत वहीँ से… 

श्री खंड टॉप के लिए जो आख़िरी चढ़ाई है ना वो जादुई और मायावी है। यहाँ का रास्ता असाधारण है और दुनिया यहाँ अलौकिक दिखती है। रास्ते का मिजाज़ एक है पर नज़ारा पल- पल बदलता है। रास्ता आपको मंत्रमुग्ध करता है, कहीं आपको लगेगा कि अब इससे आगे चलना नहीं हो पायेगा तो दूसरे ही पल आप उड़ते हैं। 

इस चढ़ाई का अपना मिथिहास भी है। इसे भीम की सीढ़ी कहा जाता है – सीढ़ी इसलिए क्यूँकि सही में अब चलने के लिए रास्ता नहीं होता, बस बहुत बड़े-बड़े पत्थर मिलते हैं जिन पर से आपको चढ़ना होता है। माना जाता है कि ये पत्थर भीम ने ऊपर से फेंके थे ताकि श्रीखंड महादेव तक पहुंचना इतना आसान न हो। इन पत्थरों पर आपको बर्फ के कटाव से बने निशान दिखते हैं – लोकल लोगों का कहना है कि ये पांडवों द्वारा लिखी गयी लिपि है जिसको अभी तक कोई ना तो पढ़ पाया है और ना ही समझ पाया है। 

कहानियाँ जो भी हों पर असलियत यही है कि इन पत्थरों पर से चलना कोई आसान खेल नहीं है। काफी जगह इतनी संकरी और ख़तरनाक चढ़ाई है कि आपकी छोटी सी ग़लती जान पर भारी पड़ सकती है। आपको यहां चलना कम चढ़ना ज्यादा होता है।
खतरनाक तो है पर अगर आप थोड़ा ध्यान से चलें तो रास्ता रोमांचक बहुत है। एक तो आपकी पहले से लगी होती है ऊपर से ये रास्ता आपकी मारता है। हर एक स्टेप पर आपको चैलेंज करता है, आपसे सवाल पूछता है। यात्रा के ख़त्म होने का यकीन आपको तभी होता है जब सफर के आख़िरी मोड़ से आप पहली बार श्री खंड के दर्शन करते हैं। इस बात को जब आप खुद जाएंगे तभी समझेंगे। क्यों @उत्कर्ष और जितिन भाई, सही कहा ना?  

पर जो भी हो प्रकृति का असली रोमैन्स आपको यहीं दिखता है। सारी दुनिया नीचे रह चुकी होती है और चलते हुए अब मस्त 360 व्यू आता है। चारों साइड बादलों की सफ़ेद परत दिखती है जो मख़मालि फर्श लगती है। सिर्फ ऊँचे-ऊंचे पहाड़ों की चोटियां इन बादलों से ऊपर झांकती हुई दिखती हैं।    

अगर मौसम साफ़ रहता है तो आपको श्रीखंड टॉप नीचे से दिख जाता है। कभी- कभी तेज़ हवा बादलों को साथ उड़ा ले जाती है तो नीचे का नज़ारा साफ़ दिखता है – नीचे पूरी वैली हरे रंग में नहाई हुई दिखती है और पहाड़ों की चोटियों से नीचे गिरते झरने दूर से मोतियों की माला लगते हैं। ऐसा लगता है जैसे कि किसी ने पहाड़ों की हरियाली में चार चाँद लगाने के लिए उनपर मोतियों की माला से सजावट की हो। 

प्रकृति जीवित दिखती है और सभी नज़ारे इसकी जादूगरी। सदियों से सहेजी गयी कहानियां हवाओं के साथ आपको कानों में पड़ती हैं जिनको आप  सुनें तो आप जाग उठते हैं। समझ आता है की प्रकृति के समीप समर्पण  ही सशक्तिकरण है।         

देखिये जी ट्रैवेलिंग बहुत ही सब्जेक्टिव चीज़ है और सबका अपना- अपना व्यक्तिगत तरीका है ट्रेवल को एक्सपीरियंस करने का, उसे समझने का, उससे सीखने का और ख़ासकर जहाँ आप जा रहे हैं उस जगह को जानने का।   

और हमारा मानना सिंपल है – कि किसी जगह और वहाँ के लोगों को जानने का सबसे बेहतर और एकमात्र तरीका है उस जगह पर खुद जाकर उसको एक्सपीरियंस करना। सिर्फ एक बार नहीं बल्कि बार – बार, अलग मौसम और अलग-अलग तरीकों से। उस जगह के ऊपर बनाई गई कोई वीडियो या उस पर लिखा हुआ, कैसा भी, कोई भी लेख आपको वो एक्सपीरियंस नहीं करा सकता जो आप खुद वहां जाकर करते हैं। क्यूंकि सबका अपना तरीका है और सबकी अपनी कहानियां। हमारे लिखने या वीडियो बनाने का एक ही मकसद होता ही की आप वहाँ जाएँ और ख़ुद एक्सपीरियंस करें।   

दर्शन – दर्पण – अर्पण – सम्मोहन – सशक्तिकरण – समर्पण 

कुछ इस तरह रहा हमारी श्रीखंड यात्रा का कुल एक्सपीरियंस और जैसा हमने अनुभव किया ठीक वैसा आप लोगों के साथ शेयर करने की कोशिश की। उम्मीद है कि आप लोगों को भी पढ़ कर मज़ा आया होगा – ज़्यादा नहीं तो थोड़ा ही सही। बाबा जी की भाषा में कहें तो हमारी यात्रा फूल जैसी रही! आप जायें तो बतायें हमें की आपकी यात्रा का सार क्या रहा।आपका इंतज़ार रहेगा कमेंट सेक्शन में।

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