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मलाणा – मिथ, पॉपुलिज़्म और बक़ैती

A kid in Malana Village
Malana Village, 2017

यह किस्सा पुराना है, मलाणा जितना तो नहीं, पर हाँ. 

किस्से, कहानियों और कविताओं के साथ, इस बार, हमारा नया सफर शुरू हुआ पार्वती वैली के पास बसे मलाणा गांव के लिए। मलाणा का नाम तो आप सब ने सुना ही होगा – एक ऐसी जगह जिसकी अस्तित्वता के लिए शायद उसका नाम ही काफी है. अपने अलग समाज और संस्कृति के साथ, मलाणा मुख्यतः यहां उगी भांग की फसल के लिए विश्व विख्यात है. यहां का माल (हैश-क्रीम) दुनिया का सबसे बेहतरीन माना जाता है. हिमाचल के कुल्लू में होते हुए भी, नार्थ-ईस्ट कुल्लू के बाकी गावों से अलग जान पड़ेगा. 

                                                          मलाणा गांव और सामने वाला पहाड़.

मलाणा गांव समुन्द्र-ताल से करीब 2,६५२ मीटर (8,701 फ़ीट) ऊपर बसा छोटा सा, पर न जाने कितना पुराना गांव है. यहां के लोग खुद को सिकंदर के करीबी वंशज कहते हैं. इसलिए अपने को बाकी हिमाचली प्रजातियों से अलग और ऊपर मानते हैं. हिमाचल से बाहर के लोगों को तो ये खुद को छूने भी नहीं देते. इसके अलावा बाहरी लोगों को यहां के मंदिरों में प्रवेश करने और छूने की भी मनाही है. इनकी भाषा और बोली भी हिमाचली भाषा परिवार 

इस गांव के बारे में लोगों की बातों और इन्हीं किस्सों के चलते हमारा यहां जाने का सीन बना. हालाँकि उस समय हम लोग किसी और काम-धंधे में लगे हुए थे, घूमना-फिरना काम ही हो पाता था. पर मलाणा के लिए समय हमने समय निकाल ही लिया। दिल्ली से भुंतर और वहां कसोल की बस पकड़कर पहुंच गए पार्वती घाटी। 

 रास्ते भर बस में, और रात भर कसोल में, हम बस मलाणा की सुनी- सुनाई कहानियों को अपने ज़हन में घोले जा रहे थे. इंतज़ार करना मुश्किल हो रहा था. कसोल में रात बिताने के बाद,अगले दिन हम मलाणा के लिए रवाना हो गए. रास्ता एक दम सीधा है. भुंतर से कसोल आते समय, जरी के पास Malana Hydro Power Plant आता है. यहां से मालाणा गांव के लिए एक अलग पतली सी सड़क निकलती है, उस पर चलते जाओ, आप मलाणा पहुँच जाओगे। 

मलाणा से हाइड्रो पावर प्लांट तक तो हमने बस पकड़ कर आा गए थे. आगे का रास्ता तय करने के लिए पहले तो हमने किसी शेयरिंग गाडी/टैक्सी का इंतज़ार किया। कुछ देर रुकने के बाद सोचा कि पैदल ही चलते हैं, पीछे से कोई गाडी आयी तो बैठ लेंगे, और हम निकल लिए. 

मलाणा जाने वाली सड़क है ही इतनी खूबसूरत की आपका रुकने का मन ही नहीं करेगा। हम भी चले जा रहे थे, पर तब तक, जब तक सूरज सर नहीं चढ़ा था. धूप बढ़ते ही हमारे तोते उड़ने लगे. रुकते-चलते हम आगे बढ़ रहे थे कि अपने को पीछे सी गाडी की आवाज़ सुनाई पड़ती है. हमने गाडी वाले भाई जी को रुकने के लिए दिया, और पैसों की बात करके गाडी में बैठ गए. आधे घंटे में हम मलाणा गांव के एंट्री गेट पर थे. 

सड़क आपको यहीं तक मिलती है. मलाणा गांव में पहुंचने के लिए अब आपको ट्रेक करना पड़ता था. मलाणा यहां से ज्यादा दूर नहीं है, कुछ २-३ किलोमीटर की बात है. पर यह दो- तीन किलोमीटर आपके पसीने छुड़ाने काफी है. हमने जितना एक्सपेक्ट नहीं किया था, ट्रेक उतना मुश्किल निकला। फिर हमारी लगाने में रही सही कसर धुप ने पूरी कर दी. हांफते-हांफते हम गांव के मुहाने तक पहुँच गए. यहां हमने ओपन कैफ़े देखा तो सोचा कि थोड़ा सुस्ता लेते हैं. यहां बैठे तो अपने को बकचोदी का मौका मिल गया. कैफ़े वाले भाई जी ने चिल्लूम ऑफर कर दी. वहां मलाणा का एक भाई और बैठा था साथ में, कैसे मना कर देते। मलाणा वाला भाई बैठा तो साथ, साथ चिल्लूम भी लगाई, पर अलग साफी से पी. साथ बैठ कर भी भाई दुरी पर था. फिर बातों बातों में उसने बताया कि कैसे मलाणा के लोग खुद कोई होमस्टे या कैफ़े नहीं खोल सकते। उनके हिसाब से ये काम उनके लिए नहीं है. हमको धीरे- धीरे बात समझ आई. पर वहीँ बैठे -बैठे हमको  मलाणा का ट्रेलर देखने को मिल गया.

कुछ घंटो में इतनी बातें हो गई थी कि मलाणा वाला भाई शहरी दुनिया की किस्से सुनकर फूल ऑन चिल्ल था, और बदले में हमें मलाणा के किस्से सुना रहा था। बातों बातों में उसने पूछा कि आज तो आप लोग यहीं रुक रहे हैं न? मैं आपको अपने एक दोस्त के होमस्टे पर ले चलता हूँ, उसने अभी चालू किया है. हमारा प्लान तो था ही मलाणा में रात बिताने का. बैठे-बिठाए ठिकाने का जुगाड़ हो गया, इससे बेहतर और क्या हो सकता था. हम लोग मलाणा वाले भाई के साथ हो लिए. कुछ दस मिनट में हम मलाणा पहुंच गए. 

(इमेज — मलाणा फर्स्ट व्यू)

पर अपने को वहां दो मलाणा देखने को मिले! 

ओल्ड मलाणा —  इतिहास की मानें तो गांव की स्थापना भृगु ऋषि के द्वारा की गई थी. इसका जिक्र कई पुराणिक कथाओं और गांव के बड़े- बूढ़ों की बातों में मिलता है. मलाणा गांव का अपना अलग जुडिशरी सिस्टम भी है, जिसका अमल यहां के लोग करते हैं. चक्कर लगाया तो एक चीज़ की छाप लोगों पर बहुत गहरी दिखी; इनकी मान्यताओं पर इनके विश्वास की. गांव के लोगों ने अपनी मान्यताएं, अपनी धरोहर और अपनी संस्कृति, संग अपनी भाषा को अभी तक अच्छे से पकड़ के रखा है. क्या पता यही सब इनको इनका प्राइड देता हो. 

अपने आप को ये लोग सिस्टम से बेशक अलग मानते हों, इनका रहन-सहन, जीवन शैली तो किसी और गांव के लोगों की तरह ही है. लोग जीवन निर्वाह खेती के दम पर करते हैं. खेती में, पहाड़ों में होने वाली सभी फसलें होती हैं. खासकर तो भांग की खेती; इस पौधे की फसल के लिए अनुकूल वातावरण के चलते, यहां का माल बेस्ट ऑफ़ थे क्वालिटी में आता है. 


न्यू मलाणा – पुरानी मान्यताओं, कहावतों और किस्से-कहानियों से हटकर, मलाणा की एक नई शक्ल देखने को मिली अपने को। गांव की तफरी मारते समय नज़रें घुमाई तो पता लगा कि गांव में डिश-एंटीने लगे हुए हैं. गांव में स्कूल, बैंक और खरीदारी के लिए सभी चीज़ें उपलब्ध हैं. अपनी एज के लोंडो के हाथ में स्मार्टफोन भी दिख ही जाएंगे। जो तस्वीर हम बना कर चले थे, उतना पिछड़ा तो नहीं था मलाणा। अपनी पहचान, अपने इतिहास और संस्कृति को बचाये रखने की जद्दोजहद के साथ, नई- दुनिया के साथ कदम मिलाने को तैयार खड़ा दिखा हमको मलाणा। इसका ट्रेलर हम कैफ़े पर मिले भाई जी से मिलकर देख ही चुके थे. 

 मलाणा गांव को हमेशा से बस एक Narco Tourism Hub की तरह पेश किया जाता रहा है. शायद इसी वजह से मलाणा एकदम अलग ही इमेज के साथ दिखता रहा है. July, 2017  में, गाँव के करीब आधा दर्जन गेस्ट हाउस और रेस्टॉरेंटस बंद करने के साथ ही लोगों ने अपने दरवाज़े  ऑफिशियली बाहर के लोगों क लिए भी बंद कर लिए. इससे कुछ एक महीने पहले ही गाँव की पंचायत फोटोग्राफी पर बैन लगा चुकी थी. फिलहाल, Kasol, Kheerganga और Triund की हालत देखकर बोलें तो शायद मलाणा के लोगों ने सही फैंसला लिया. नहीं तो, क्या पता, आने वाले कुछ सालों में, यह लोग भी अपने शोर-शराबे, गंदगी, और प्लास्टिक के बीच पाते. वैसे साफ़-सफाई की चिंता मलाणा के लोगों में भी कम ही दिखी.   

प्रकृति के प्रति सिर्फ आभार रखने का वक़्त जा चुका है, जरुरत है तो साथ मिलकर नेचर को नर्चर करने की!         

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