स्वामी विवेकानंद और राष्ट्रीय युवा दिवस: शिकागो भाषण से वसुधैव कुटुंबकम् तक
स्वामी विवेकानंद जी की जयंती, जिसको हम राष्ट्रीय युवा दिवस के नाम से मनाते हैं. सुबह सुबह आंख खुली तो सोशल मीडिया पर एक ‘फ़कीर- नेता’ को इनके नाम पर पर्चियां फाड़ते सुना. संदेश उसी युवा शक्ति को था जिसको पढ़ते पढाते कूट दिया जाता है. पर यह सोचकर थोड़ा सा सुकून आया कि देखो ताकतवर भी कितना मजबूर है, माने न माने, पर तब भी ‘सत्य’ को उन्हें भी दोहराना पड़ रहा है. बेशक वो अपनी ‘मैं’ में लीन हैं, पर बात तो तब भी विवेकानंद जी की ही कर रहे हैं. फिर ध्यान आया कि जब विवेकानंद जी खुद बोल सकते हैं, तो उनके बारे में किसी की कही हुई क्यूं सुनें.
अपन लोग ने इन्हें नैतिक शिक्षा में पांचवीं में पहली बार ध्यान से पढ़ा था. इनकी नैतिक शिक्षा में आप चाहें तो हिंदू- धर्म पढ़ लें, मानवता सीख लें, सनातन शिक्षा पा लें, या तो आजकल का फेमस टर्म ‘ग्लोबल- सिटिज़न’ का महत्व समझ लें. सब मिल जाएगा. अपने टाइम में विवेकानंद जी एक आध्यात्मिक गुरु और समाज सुधारक रहे. इन्होंने पुरोहितवाद, ब्राह्मणवाद, धार्मिक कर्मकाण्ड इत्यादि विसंगतियों को दूर कर, हिंदू- धर्म को और अधिक बल दिया. धर्म के विषय में लोगो का नजरिया बदलते हुए, लोगो को अध्यात्म तथा वेदांत से परिचित कराया.
थोड़ा पीछे चलें तो कलकत्ता में 12 जनवरी 1863 को जन्मे इस बालक का असली नाम नरेंद्रनाथ दत्त था. बचपन से ही तेज़ दिमाग, तर्कशील सोच और अध्यात्म की तरफ झुकाव- ये तीनों चीज़ें एक साथ मिलना कोई आम बात नहीं. पढ़ाई में जितने होशियार, उतने ही सवाल पूछने वाले भी. भगवान को माना जाए या नहीं, इसी उधेड़बुन में जब कई पंडितों, विद्वानों के पास गए तो जवाब न मिला. फिर मुलाकात हुई रामकृष्ण परमहंस से. यहीं से नरेंद्रनाथ का सफर विवेकानंद बनने की तरफ शुरू हुआ. गुरु रामकृष्ण ने इन्हें सिखाया कि हर जीव में परमात्मा का वास है, और इंसान की सच्ची सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है- “जीव में शिव” का यही भाव आगे चलकर विवेकानंद के पूरे दर्शन की बुनियाद बना.
गुरु के देहांत के बाद विवेकानंद परिव्राजक बन गए- यानी एक घुमक्कड़ संन्यासी, जिसने पूरे भारत की खाक छानी. कन्याकुमारी के उसी समुद्र किनारे वाली चट्टान पर बैठकर, जहां आज विवेकानंद रॉक मेमोरियल है, उन्होंने भारत की गरीबी, जातिवाद, अशिक्षा को बहुत करीब से देखा और महसूस किया. यहीं वो तय करते हैं कि सिर्फ अध्यात्म से काम नहीं चलेगा, आम आदमी की भूख और उसकी गरिमा भी उतनी ही ज़रूरी है. “पहले रोटी, फिर धर्म”- ये सोच उस दौर के लिए क्रांतिकारी थी.
अब बात उस किस्से की, जिसके लिए ये लेख शुरू हुआ था. साल 1893, अमेरिका के शिकागो शहर में विश्व धर्म सम्मेलन (Parliament of the World’s Religions) का आयोजन हो रहा था. भारत से किसी सरकारी संस्था ने विवेकानंद को नहीं भेजा था- वो खुद, मैसूर, रामनाड और खेतड़ी के राजाओं तथा कुछ शिष्यों की मदद से जुटाए गए पैसों के सहारे, अकेले समंदर पार गए. न ठीक से अंग्रेज़ी बोलने वालों की पहचान, न किसी संस्था का नाम, न भाषण देने का न्योता कन्फर्म. मंच पर पहुंचने से पहले तक इन्हें कई बार दरवाज़े से लौटाया गया.
11 सितंबर 1893 को जब आखिरकार इन्हें बोलने का मौका मिला, तो सामने करीब सात हज़ार लोगों की भीड़ थी- दुनिया भर के विद्वान, पादरी, धर्मगुरु. बाकी वक्ताओं ने अपने-अपने धर्म, देश, संस्था का शुक्रिया अदा करते हुए भाषण शुरू किए थे. विवेकानंद की बारी आई तो वो एक पल को घबराए, मन ही मन सरस्वती को नमन किया, और फिर अपने पहले ही वाक्य से पूरे हॉल को अपना बना लिया- “सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका”. बस इतना कहते ही सात हज़ार लोग खड़े होकर, दो मिनट तक तालियां बजाते रहे. सोचिए, अभी उन्होंने अपनी बात शुरू भी नहीं की थी, सिर्फ संबोधन के दो शब्दों ने ही इतना असर कर दिया- क्योंकि बाकी सब जहां औपचारिकता निभा रहे थे, वहां एक भारतीय संन्यासी ने पूरी दुनिया को एक परिवार की तरह भाई-बहन कहकर बुला लिया.
आगे अपनी उसी स्पीच में उन्होंने भारत की उस सोच को दुनिया के सामने रखा जो हज़ारों साल पुरानी है- “वसुधैव कुटुंबकम्”, यानी पूरी धरती ही एक परिवार है. उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म सिर्फ सहनशीलता में नहीं, बल्कि हर धर्म को उतना ही सच मानने में विश्वास रखता है, जितना अपने धर्म को. जिस वक्त पश्चिमी दुनिया धर्म और राष्ट्र की सीमाओं में बंटी लड़ रही थी, उसी वक्त एक भारतीय मंच से खड़े होकर कह रहा था कि इंसान होने की पहचान, किसी भी धर्म, देश या जाति की पहचान से बड़ी है. आज जिसे हम ‘ग्लोबल सिटिज़न’ कहकर एक फैशनेबल टर्म की तरह इस्तेमाल करते हैं, विवेकानंद उस सोच को सवा सौ साल पहले जी चुके थे और दुनिया को जीना सिखा भी चुके थे. वो राष्ट्रीयता के खिलाफ नहीं थे, बल्कि उनका मानना था कि सच्ची राष्ट्रीयता, वैश्विक भाईचारे में बाधा नहीं बल्कि उसकी नींव है.
शिकागो की इस एक स्पीच ने विवेकानंद को रातोंरात दुनिया के सामने ला खड़ा किया. इसके बाद वो कई सालों तक अमेरिका और इंग्लैंड में घूमे, वेदांत और योग पर लेक्चर दिए, और पश्चिम को पहली बार गंभीरता से भारतीय दर्शन से मिलवाया. भारत लौटकर 1897 में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की- जिसका मकसद सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा के ज़रिए समाज को खड़ा करना था. उनका नारा था- “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाये.” राज योग, कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग जैसी किताबें, और उनके तमाम भाषणों व पत्रों का संग्रह “द कम्प्लीट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद” आज भी अध्यात्म और आत्मबल पर लिखी सबसे प्रभावशाली रचनाओं में गिना जाता है. सिर्फ उनतालीस साल की उम्र में, 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में उनका देहांत हो गया- लेकिन इतने कम समय में उन्होंने जितना काम किया, उतना बड़े-बड़े लोग सदियों में नहीं कर पाते.
“शक्ति जीवन है, निर्बलता मृत्यु हैं। विस्तार जीवन है, संकुचन मृत्यु हैं। प्रेम जीवन है, द्वेष मृत्यु हैं।”
Strength is Life, Weakness is Death. Expansion is Life, Contraction is Death. Love is Life, Hatred is Death.
यही वजह है कि उनके जन्मदिन, 12 जनवरी को भारत सरकार ने 1984 में राष्ट्रीय युवा दिवस घोषित किया, और तब से हर साल ये दिन उन्हीं के नाम मनाया जाता है. क्योंकि विवेकानंद सिर्फ एक संत नहीं थे, वो खुद एक युवा थे जिसने सवाल पूछे, संदेह किया, भटके, और फिर अपने रास्ते खुद तराशे. आज के युवा से भी वही उम्मीद है- सवाल पूछो, डरो मत, और जो भी करो, पूरी शक्ति से करो.
अब जब अंग्रेज़ी और हिंदी दोनो में और दोनों भाषओं के लिए, एक ही बन्दा इतना ज्यादा रेलेवेंट हो जाए तो, ये ज़रूरी है कि हम ठहरें, बैठे और बिठाएँ और उसके बाद 2 मिनट तसल्ली से सीखें। विश्व युवा दिवस पर हम युवाओं को बहुत कुछ बेहद जल्द सीखने की ज़रूरत है।


