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मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना — तो फिर सिखाता क्या है?

Tanglangla Mountain Pass in Ladakh
सस्ते नशे में लिखा एक मिसरा, या एक शायर की सबसे बड़ी उम्मीद?

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना — तो फिर सिखाता क्या है?

अगर अल्लामा आज ज़िंदा होते, तो सबसे पहले हम उनसे यही पूछते — साब, यह मिसरा लिखते वक़्त आपने कौनसा नशा किया था? “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना” — इतनी ख़ूबसूरत, इतनी उम्मीद से भरी बात, कि सुनकर लगे शायद दुनिया सच में ऐसी ही होगी। और फिर बाहर निकलकर अख़बार उठाइए, टीवी खोलिए, या बस अपने ही मोहल्ले की गली में खड़े होकर सुन लीजिए — हर मज़हब, हर धर्म, हर फ़िरक़ा यही समझाने में लगा है कि सही सिर्फ़ वही है, बाक़ी सब भटके हुए हैं।

अब यहाँ बैर का मतलब भी समझ लीजिए, क्योंकि उर्दू का यह लफ़्ज़ हल्का नहीं है — बैर यानी मन-मुटाव, वह गांठ जो तब बंधती है जब सामने वाला वैसा नहीं सोचता जैसा हम चाहते हैं, वैसा नहीं करता जैसा हमने तय कर रखा है। और जिस दिन से इंसान ने मज़हब को एक “सही तरीक़ा” मान लिया, उसी दिन से हर दूसरा तरीक़ा “ग़लत” हो गया। यह गणित बड़ा सीधा है — जहाँ एक सही है, वहाँ बाक़ी सब अपने आप ग़लत हो जाते हैं। तो सवाल यह नहीं कि मज़हब बैर सिखाता है या नहीं — सवाल यह है कि क्या कोई मज़हब बिना यह माने चल भी सकता है कि बाक़ी सब उससे कम सही हैं?

अगर आपको हमसे बेहतर जवाब पता है, माशाअल्लाह, ज़रूर बताइए। वरना मान लीजिए कि मज़हब के नाम पर आपका भी कुछ न कुछ काटा गया है, और सबसे बड़ी तकलीफ़ यही है कि आप उसे किसी को बता भी नहीं सकते। और जिसे लगता है कि उसका किसी मज़हब-धर्म से कोई वास्ता नहीं — तो जनाब, आप ख़ुशनसीब हैं, आप विशुद्ध छूटे हुए इंसान हैं।

अब बात उस शख़्स की, जिसने यह मिसरा लिखा

अगर आपको नहीं पता कि अल्लामा कौन हैं, तो शर्म की बात नहीं — बस थोड़ा और पढ़ लीजिए। यह वही शख़्स हैं जिन्होंने लिखा था “सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तां हमारा” — जी हाँ, इक़बाल साब। और “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना” उसी मशहूर तराने का एक मिसरा है, जिसे आज हम स्कूल की सुबह की असेंबली में गाते बड़े हुए हैं, बिना यह जाने कि इसे लिखने वाला बाद में किस मोड़ पर जाकर खड़ा हुआ।

मुहम्मद इक़बाल — जिन्हें दुनिया “अल्लामा” यानी बड़ा विद्वान कहकर पुकारती है — 9 नवंबर 1877 को सियालकोट में पैदा हुए, तब का पंजाब, तब का अविभाजित हिंदुस्तान। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से पढ़े, फिर कैंब्रिज गए, और जर्मनी की म्यूनिख यूनिवर्सिटी से फ़लसफ़े में पीएचडी की — विषय था फ़ारसी तसव्वुफ़ में तत्वमीमांसा का विकास। यह वह दौर था जब एक हिंदुस्तानी नौजवान यूरोप जाकर पश्चिमी फ़लसफ़ा पढ़ता था और वापस आकर अपनी ही मिट्टी को नए सिरे से समझने की कोशिश करता था।

“तराना-ए-हिंदी” — जिसमें यह मशहूर मिसरा आता है — इक़बाल ने 1904 में लिखा, बंटवारे से पूरे तैंतालीस साल पहले। उस वक़्त का हिंदुस्तान एक था, और उस नज़्म में एक जवान शायर की वह उम्मीद बोलती है जो हर मज़हब, हर ज़बान, हर तहज़ीब को एक ही ज़मीन का हिस्सा मानती थी। यही वह इक़बाल हैं जिन्होंने “नया शिवाला” लिखा, जिन्होंने राम को “इमाम-ए-हिंद” कहकर पुकारा, जिन्होंने गुरु नानक पर नज़्म लिखी। यह किसी एक मज़हब का शायर नहीं था — यह हिंदुस्तान की मिली-जुली रूह का शायर था।

फिर वह मोड़ आया, जिसे इतिहास बड़ी सफ़ाई से याद रखता है

बाद के बरसों में इक़बाल का रुख़ बदला। 1930 में इलाहाबाद के अपने मशहूर ख़ुत्बे में उन्होंने बरतानवी हिंद के मुसलमानों के लिए एक अलग सियासी दायरे का ख़याल पेश किया — वह ख़याल जो आगे चलकर “दो-क़ौमी नज़रिये” की बुनियाद बना, और जिसे बाद में तारीख़ ने पाकिस्तान की तामीर से जोड़ दिया। यह भी सच है, और इसे झुठलाना बेईमानी होगी।

लेकिन एक और सच है, जिसे अक्सर जल्दबाज़ी में भुला दिया जाता है — इक़बाल का इंतक़ाल 21 अप्रैल 1938 को लाहौर में हुआ, बंटवारे से पूरे नौ साल पहले। उन्होंने न कभी पाकिस्तान देखा, न बंटवारे का दर्द, न वह लकीर जो बाद में लाखों घरों, लाखों दिलों के बीच खिंची। उनकी क़ब्र लाहौर की बादशाही मस्जिद के सामने है — उसी शहर में, जो उनका था, उनके ज़िंदा रहते हुए भी और आज भी। बंटवारे ने बस इतना किया कि उस ज़मीन का नाम बदल दिया जहाँ वह पहले से लेटे हुए थे। उनका दिल, उनकी सोच, उनकी शायरी — वह कभी किसी सरहद से बंधी ही नहीं थी। पाकिस्तान ने उन्हें “क़ौमी शायर” का ख़िताब ज़रूर दे दिया, मगर जिस इंसान ने “सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तां हमारा” लिखा हो, उसकी रूह किसी एक झंडे में क़ैद कैसे हो सकती है?

यही इक़बाल की सबसे बड़ी ट्रेजेडी है, और शायद सबसे बड़ी ख़ूबसूरती भी — कि वह एक साथ कई विरोधाभासों के शायर हैं। “ख़ुदी” का फ़लसफ़ा देने वाला शायर, जो कहता है कि इंसान को अपनी ज़ात को इतना बुलंद करना चाहिए कि ख़ुदा ख़ुद उससे पूछे कि तेरी क्या मर्ज़ी है — यही शायर “बाल-ए-जिब्रील”, “बांग-ए-दरा”, “ज़र्ब-ए-कलीम” और “जावेदनामा” जैसी किताबें भी देता है, जो आज भी उर्दू-फ़ारसी अदब की बुनियादी इमारतों में शुमार होती हैं। इक़बाल सिर्फ़ शायर नहीं थे — फ़लसफ़ी थे, वकील थे, और एक ऐसे मुफ़क्किर थे जिनकी सोच का दायरा मज़हब से कहीं आगे तक फैला हुआ था।

तो फिर सवाल वहीं का वहीं रह जाता है

शायद इक़बाल ख़ुद भी अपनी ज़िंदगी के आख़िर तक इस उलझन में रहे हों कि मज़हब सच में बैर नहीं सिखाता, या यह सिर्फ़ एक जवान शायर की ख़ूबसूरत ख़ुशफ़हमी थी, जो वक़्त के साथ सियासत के हाथों टूटती चली गई। हो सकता है 1904 का इक़बाल सही था, और 1930 की सियासत ने उसे मजबूर कर दिया कि वह अपने ही लिखे को झुठलाए। या शायद दोनों इक़बाल सही थे — एक इंसान के अंदर उम्मीद और मजबूरी दोनों एक साथ रह सकती हैं, यह कोई नई बात नहीं।

हमारी तरफ़ से बस इतना कहना है — अगली बार जब कोई यह मिसरा गुनगुनाए, “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना”, तो एक पल रुककर यह भी सोचिएगा कि यह लिखने वाला शख़्स ख़ुद अपनी ज़िंदगी में इस सवाल से कितना जूझा था। और शायद यही उसकी असली इज़्ज़त है — कि वह जवाब देने से पहले ख़ुद सवाल में जीता रहा।

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