महापंडित राहुल सांकृत्यायन — वो नाम जिसके सामने हर ट्रैवलर को झुक जाना चाहिए
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
~ ख़्वाजा मीर दर्द
पहले-पहल जब यह शेर सुना तो लगा शायद मिर्ज़ा ग़ालिब का होगा। फिर जब राहुल जी की ज़िंदगी के बारे में जाना, तो एक पल के लिए यक़ीन हुआ कि यह उन्हीं के सफ़र का निचोड़ है। पर हक़ीक़त में यह शायरी ख़्वाजा मीर दर्द की कलम से निकली थी, और यक़ीनन आपने भी कभी न कभी इसे कहीं सुना होगा।
अजीब बात है कि यह शेर जितना राहुल सांकृत्यायन की ज़िंदगी पर फ़िट बैठता है, उतना शायद ही किसी और पर बैठता हो। मानो ख़्वाजा मीर को अपनी लिखी बात के सैकड़ों बरस बाद जन्म लेने वाले इस बंदे का अंदाज़ा पहले से ही रहा हो।
राहुल कौन थे, ये फ़िल्म वाला किस्सा नहीं है
नाम सुनकर किसी और राहुल का ख़याल आए तो रोक लीजिए। यह बात है यात्रादर्शन को हिंदी में असली मायने देने वाले महापंडित राहुल सांकृत्यायन की, जिनका जन्म 9 अप्रैल 1893 को आज़मगढ़ ज़िले के एक गाँव में हुआ था। बचपन का नाम केदारनाथ पांडे था, जो आगे चलकर रामोदार साधु और फिर अंततः राहुल हो गया।
नाम बदलने की यह कहानी उतनी ही घुमावदार है जितना उनका जीवन। घर से भाग निकलने की आदत उन्हें बचपन में ही लग गई थी, और उम्र के साथ यह आदत जुनून में बदल गई। संन्यास लिया, बौद्ध धर्म में दीक्षा ली, आज़ादी की लड़ाई में जेल गए, और इस सबके बीच एक के बाद एक देश नापते चले गए — तिब्बत, नेपाल, चीन, श्रीलंका, रूस, इंग्लैंड, यूरोप, जापान, कोरिया, ईरान। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी के क़रीब 45 साल घर से दूर, सफ़र में ही बिताए।
तिब्बत की उनकी यात्राएं ख़ासतौर पर याद रखने लायक हैं। वहां से वे खच्चरों पर लादकर सैकड़ों दुर्लभ पांडुलिपियां भारत ले आए, जो आज भी पटना के संग्रहालय में सुरक्षित रखी हैं। यह काम किसी टूरिस्ट का नहीं, एक विद्वान की ज़िद का था।
उनकी भाषाओं की पकड़ भी उतनी ही चौंकाने वाली थी। हिंदी, उर्दू, संस्कृत, अरबी, फ़ारसी, पालि, तिब्बती, रूसी, फ्रेंच, जापानी सहित करीब तीन दर्जन भाषाओं का ज्ञान रखने वाले राहुल जी को काशी के पंडितों ने ख़ुद ‘महापंडित’ की उपाधि दी — यह ख़िताब आज तक सिर्फ़ उन्हीं के नाम है।
एक कट्टर ब्राह्मण घर से निकलकर एक मुक्त विचारक तक का सफ़र
जिस परिवार में राहुल जी का जन्म हुआ, वह पक्का सनातनी ब्राह्मण घराना था। पर घुमक्कड़ी ने उन्हें रूढ़ियों में बंधे रहने नहीं दिया। रास्ते में जो भी तर्क, जो भी नया विचार, जो भी दर्शन उनके सामने आया, उन्होंने उसे बेझिझक अपनाया और आगे बढ़ते गए। यही वजह है कि एक ब्राह्मण घर का लड़का आगे चलकर आर्य समाजी बना, फिर बौद्ध भिक्षु की तरह दीक्षा ली, और अंततः मार्क्सवाद की तरफ़ झुक गया। स्टालिन, लेनिन, कार्ल मार्क्स और माओ त्से तुंग पर उन्होंने अलग से किताबें तक लिखीं — यह बात अपने आप में बताती है कि उनका दिमाग़ किसी एक खांचे में क़ैद रहने वाला नहीं था।
राजनीति में भी वे उतने ही सक्रिय रहे जितने साहित्य में। कांग्रेस के ज़िला मंत्री रहे, सत्याग्रह की तैयारी में शामिल रहे, बक्सर और हज़ारीबाग़ की जेलों में महीनों बिताए, और बाढ़-पीड़ितों की सेवा तक में जुटे रहे। यानी घुमक्कड़ी उनके लिए सैर-सपाटा नहीं, बल्कि दुनिया को क़रीब से समझने और उसमें शामिल होने का एक तरीक़ा थी।
उनके योगदान को सरकार ने भी कई बार माना। 1963 में, उनके निधन के उसी साल, उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था, और साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी उनके नाम रहा। 14 अप्रैल 1963 को दार्जिलिंग में उनका निधन हुआ — पर सफ़र में बिताई गई ज़िंदगी का यह अंत भी शायद उन्हीं के मिज़ाज के मुताबिक़ ही था।
उनकी क़लम से निकलीं कितनी किताबें
अक्सर लोग सोचते हैं कि इतना घूमने वाला बंदा लिखता कब होगा। जवाब है — क़रीब 150 से ज़्यादा किताबें। कहानी, उपन्यास, यात्रा वृतांत, इतिहास, दर्शन, विज्ञान, राजनीति, कोश-निर्माण — हर विधा में उन्होंने बेधड़क क़लम चलाई। नीचे उनकी कुछ सबसे मशहूर रचनाओं का एक संक्षिप्त परिचय दिया गया है, ताकि अगर आप इन्हें पढ़ना शुरू करें, तो कहां से शुरुआत करनी है, यह तय करना आसान हो जाए।
- घुमक्कड़ शास्त्र — यह सिर्फ़ किताब नहीं, घुमक्कड़ी का घोषणापत्र है। राहुल जी ने इसमें यात्रा को एक जीवन-पद्धति की तरह परिभाषित किया — सामान कैसे बांधें से लेकर अनजान जगह पर किस नज़रिए से पहुंचें, तक। जो कोई भी सफ़र को शौक़ से ज़्यादा गंभीरता से लेना चाहता है, उसके लिए यह किताब आज भी पहली सीढ़ी मानी जाती है।
- मेरी जीवन यात्रा — यह उनकी बहुखंडीय आत्मकथा है, जिसमें एक ब्राह्मण घर के भागे हुए लड़के के महापंडित बनने तक का पूरा सफ़र दर्ज है। इसे पढ़ना मतलब बीसवीं सदी के आधे भारत, आधी दुनिया को एक इंसान की आंखों से देखना।
- वोल्गा से गंगा — कहानियों के एक संग्रह के रूप में लिखी गई यह किताब असल में सभ्यता के आठ हज़ार साल के सफ़र को बयान करती है। हर कहानी एक अलग युग की झलक देती है, और साथ मिलकर यह इंसानी समाज के बदलाव की एक अनोखी झांकी बन जाती हैं।
- मेरी तिब्बत यात्रा और मेरी लद्दाख यात्रा — इन यात्रा-वृतांतों में उनके हिमालय पार के सफ़रों का सीधा, बिना बनावट वाला ब्यौरा मिलता है — बर्फ़, ठंड, दुर्गम रास्ते, और उस दौर में जिस तरह की जोखिम भरी यात्रा वे अकेले करते थे, वह आज के आराम-तलब सफ़र से मीलों दूर है।
- सतमी के बच्चे — उनका एक कहानी-संग्रह, जो गांव-देहात की ज़िंदगी और वहां के किरदारों को बड़ी सादगी से सामने रखता है। यह दिखाता है कि राहुल जी सिर्फ़ दूर देशों के क़िस्से नहीं, अपनी ही ज़मीन की कहानियां भी उतनी ही गहराई से लिख सकते थे।
- दर्शन दिग्दर्शन — दुनियाभर के दार्शनिक विचारों को एक जगह समेटने वाली उनकी यह रचना बताती है कि यात्रा सिर्फ़ शरीर की नहीं, विचारों की भी होनी चाहिए।
इनके अलावा आज भारत में हिंदी में यात्रा-लेखन और शोध के लिए दिया जाने वाला सबसे बड़ा सम्मान भी उन्हीं के नाम पर है — ‘महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार’।
सोचिए, जिस मुल्क में हर साल हज़ारों लोग बैग उठाकर पहाड़ों की तरफ़ निकलते हैं, वहां का सबसे बड़ा ट्रैवल अवॉर्ड जिसके नाम पर है, उसे ख़ुद ज़्यादातर ट्रैवलर्स नहीं जानते। यह विडंबना नहीं तो और क्या है।
आज भी उन्हें पढ़ना ज़रूरी क्यों है
आजकल की ट्रैवलिंग ज़्यादातर एक अच्छी फ़ोटो और कैप्शन तक सिमट गई है। राहुल जी को पढ़ना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि उन्होंने सफ़र को एक अलग नज़रिए से देखा — जगहों को सिर्फ़ देखने के लिए नहीं, बल्कि समझने, जीने और उनसे कुछ सीखने के लिए। उनकी ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ आज भी हर उस इंसान के लिए एक ज़रूरी किताब है जो सफ़र को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाना चाहता है, न कि सिर्फ़ छुट्टियों का।
एक ऐसे दौर में जब यात्रा-लेखन इंस्टाग्राम रील्स और छोटे कैप्शन तक सिमटता जा रहा है, राहुल जी की गहराई और उनकी ईमानदार नज़र याद दिलाती है कि असली सफ़रनामा क्या होता है। हम अभी भी उनके बारे में बहुत कुछ नहीं जानते, पर उनकी किताबों के ज़रिए धीरे-धीरे जानने की कोशिश में हैं। उम्मीद है आप भी करेंगे।


