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गांधी से बड़ा ट्रेवल इन्फ्लुएंसर कोई नहीं — बापू की यात्राओं की कहानी

Mahatama Gandhi on Dandi March
गांधी से बड़ा ट्रेवल इन्फ्लुएंसर कोई नहीं!

घुमक्कड़ी, यायावरी या फिर ट्रेवल, जो जी चाहे कह लीजिए पर जब भी कोई इंसान अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर आता है और वो सब चीज़ें करने की कोशिश करता है जो वह आम तौर पर करने की सोच भी नहीं सकता है, तो ये सारी चीज़े इंसानी ज़हन पर बहुत गहरा असर करती हैं। फिर चाहे वह इंसान कितनी ही बड़ी शख़्सियत क्यों न हो, चाहे वह गाँधी ही क्यों न हो! गाँधी की तरह ही हर किसी के पास कोई न कोई गोखले भी ज़रुर होता है जो उसे यह बताता है कि क्या जरूरी है।

मोहन दास करम चंद गाँधी से महात्मा गांधी बनने के सफ़र में गाँधी का सिर्फ नाम नहीं बदला था। उनका चरित्र, उनकी सोच, रहन सहन और व्यक्तित्व, सब कुछ बदल गया था। इन सभी बदलाव की मुख्य वजह गाँधी का ट्रेवल ही रहा है फिर चाहे वो पोरबंदर से लंदन तक वकालत की पढ़ाई के लिए किया गया सफर हो या फिर दक्षिण अफ्रीका में वक़ालत के दौरान हुई बातें। यह वही वक़्त था जब गाँधी ने पहली दफ़ा कस्तूरबा से अपना मैला खुद ढोने की बात कही थी।

और असली गोखले वाला किस्सा तो भारत लौटने के बाद शुरू हुआ। 9 जनवरी 1915 को जब गाँधी दक्षिण अफ्रीका से लौटकर बॉम्बे के अपोलो बंदर पर उतरे, तब तक वो दुनिया के लिए एक जाना-पहचाना नाम बन चुके थे। बीस साल की लड़ाई, सत्याग्रह का प्रयोग, नस्लभेद के खिलाफ खड़ा होना — सब कुछ हो चुका था। पर पूना पहुँचकर जब वो अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले से मिले, तो गोखले ने उनसे एक वादा माँगा। कहा — एक साल तक कहीं मत बोलना, किसी राजनीति में मत पड़ना। बस निकल जाओ, पूरे मुल्क में घूमो, लोगों को देखो, उनकी तकलीफ़ें सुनो, और फिर तय करना कि क्या बोलना है। वजह सीधी थी — गाँधी बीस साल भारत से बाहर रह चुके थे, और दक्षिण अफ्रीका का भारत, असली भारत नहीं था। जिस मुल्क के नाम पर लड़ाई लड़नी है, उसे पहले जिया तो जाए।

गाँधी ने ये सलाह किताबी तरीक़े से नहीं मानी, अपने तरीक़े से जिया। दक्षिण अफ्रीका में वो फर्स्ट क्लास में सफ़र करते थे, वकील थे, हैसियत थी। पर भारत लौटते ही फैसला किया कि अब सफ़र तीसरे दर्जे के डिब्बे में ही होगा — जब उनका मुल्क तीसरे दर्जे में गुज़ारा कर रहा है, तो वो अकेले फर्स्ट क्लास के आराम का हक़दार क्यों हो? उन्होंने ख़ुद लिखा था कि लाहौर से दिल्ली के सफ़र में ट्रेन इतनी भरी थी कि दरवाज़े से घुसना नामुमकिन था। एक कुली ने बारह आने में उन्हें खिड़की से धकेल कर अंदर डाला, तब जाकर जगह मिली। गंदगी, भीड़, पानी की किल्लत, बीमारी का डर — सब कुछ झेला, और यही झेलना उनकी सबसे बड़ी सीख बना। तीसरे दर्जे के डिब्बे में उन्हें भारत का असली चेहरा दिखा — किसान, मज़दूर, आम आदमी, जिसकी ज़िंदगी की तकलीफ़ किसी अख़बार या भाषण में नहीं, बल्कि उस डिब्बे की सड़ांध और भीड़ में थी। लाहौर से त्रांकबार तक, कराची से कलकत्ता तक — उन्होंने पूरे मुल्क को नाप डाला। शांतिनिकेतन में टैगोर से मिले, हरिद्वार के कुम्भ में मची गंदगी और पाखंड देखकर हैरान हुए, मद्रास के वकीलों की तीखी अक़्ल देखी। हर स्टेशन, हर डिब्बा, हर मुसाफ़िर — गाँधी की राजनीति की पहली पाठशाला यही थी। यही वो साल था जिसने मोहनदास को वो नज़र दी, जिस नज़र से आगे चलकर उन्होंने पूरे मुल्क को एक सूत्र में बांधा।

1917 में एक किसान, राजकुमार शुक्ल, गाँधी के पीछे-पीछे लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन तक चला आया। बार-बार गुज़ारिश की — बिहार के चंपारण चलिए, वहाँ के किसानों का हाल देखिए। गाँधी उस वक़्त तक चंपारण का नाम भी ठीक से नहीं जानते थे, पर वो निकल पड़े। वहाँ अंग्रेज़ बागान मालिक किसानों से ज़बरदस्ती नील (indigo) की खेती करवाते थे — तीन कट्ठे में एक कट्ठा ज़मीन पर नील बोना अनिवार्य था, चाहे किसान चाहे या न चाहे। गाँधी वहाँ पहुँचे तो प्रशासन ने उन्हें ज़िला छोड़ने का हुक्म दे दिया। गाँधी ने मना कर दिया, गिरफ़्तारी दी, और यहीं से भारत की धरती पर पहला सत्याग्रह खड़ा हुआ। ग़ौर करने वाली बात ये है कि गाँधी को चंपारण की तकलीफ़ किताबों से नहीं, बल्कि वहाँ जाकर, किसानों के बीच रहकर, उनके खेतों में उतरकर पता चली। वो हफ़्तों वहीं रहे, गाँव-गाँव घूमे, बयान दर्ज किए। यात्रा के बिना चंपारण नहीं होता, और चंपारण के बिना सत्याग्रह का वो पहला मॉडल नहीं बनता जो आगे चलकर पूरे आज़ादी के आंदोलन की बुनियाद बना।

चंपारण के फ़ौरन बाद गुजरात के खेड़ा में सूखे की मार झेल रहे किसानों का लगान माफ़ करवाने के लिए गाँधी वहाँ गए, गाँव-गाँव पैदल घूमे। उसी दौर में अहमदाबाद की मिलों में मज़दूरों की भूख हड़ताल के बीच जाकर खड़े हुए। हर बार वही तरीक़ा — पहले वहाँ जाना, ज़मीन पर उतरना, फिर बोलना। भाषण से पहले सफ़र, नारे से पहले नज़रें।

1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया — एक ऐसा आयोग जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, भारत के संवैधानिक भविष्य पर फ़ैसला लेने के लिए — तो पूरे मुल्क में “साइमन गो बैक” के नारे गूंजे। यह विरोध सिर्फ़ दिल्ली या बॉम्बे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहर-दर-शहर फैला, हर जगह जहाँ कमीशन का काफ़िला पहुँचा। लाहौर में लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज हुआ, जिसकी चोटों से बाद में उनकी मौत हो गई। यह पूरा दौर गाँधी और कांग्रेस के लिए एक और सबक था — कि भारत की आवाज़ किसी एक शहर की आवाज़ नहीं, हर कोने की आवाज़ है, और उस आवाज़ तक पहुँचने का एक ही रास्ता है — वहाँ जाना।

1930 का दांडी मार्च गाँधी की सबसे मशहूर यात्रा है, और यहाँ यात्रा सिर्फ़ समझने का ज़रिया नहीं रही — यात्रा ख़ुद विरोध का हथियार बन गई। साबरमती आश्रम से दांडी तक, क़रीब 385 किलोमीटर, चौबीस दिन, पैदल। नमक पर अंग्रेज़ी टैक्स के ख़िलाफ़ यह मार्च शुरू में महज़ 78 लोगों के साथ निकला था, पर जैसे-जैसे गाँधी गाँव-गाँव से गुज़रे, हज़ारों लोग जुड़ते गए। हर गाँव में गाँधी रुकते, लोगों से बात करते, सुनते। दांडी पहुँचकर जब उन्होंने मुट्ठी भर नमक उठाया, तो वो सिर्फ़ एक क़ानून तोड़ने का पल नहीं था — वो बरसों की यात्राओं का नतीज़ा था। एक ऐसा नेता जो जानता था कि आम आदमी की सबसे बुनियादी ज़रूरत — नमक — पर टैक्स लगाना कितना बड़ा अन्याय है, क्योंकि उसने ख़ुद उस आम आदमी के साथ चलकर, उसके डिब्बे में सफ़र करके, उसके गाँव में रुककर यह समझा था।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक आते-आते गाँधी की उम्र और सेहत उन्हें पहले जैसी लंबी पैदल यात्राओं की इजाज़त नहीं देती थी, पर तब तक उनकी यात्राओं की विरासत उनके साथ चलने वाले हर कार्यकर्ता में बस चुकी थी। और आज़ादी के बाद, दंगों की आग में जलते नोआखली और बंगाल में जब पूरा मुल्क उम्मीद खो चुका था, गाँधी फिर एक बार निकल पड़े — गाँव-गाँव पैदल, सांप्रदायिक हिंसा के बीचोंबीच, अकेले, सिर्फ़ इसलिए कि उन्हें यक़ीन था कि वहाँ पहुँचे बिना, लोगों के बीच बैठे बिना, कोई हल नहीं निकलेगा। बहत्तर साल की उम्र में भी, उनका यही मानना रहा कि दूर बैठकर शांति की अपील करने से बेहतर है, वहाँ जाकर बैठना जहाँ आग लगी हो।

गाँधी का मानना था कि भारत के नाम पर बोलने का हक़ सिर्फ़ उसी को है जिसने भारत को क़रीब से देखा हो। उनका सत्याग्रह, उनकी अहिंसा, उनका स्वराज — ये सब किताबी सिद्धांत नहीं थे, ये उस भारत से निकले थे जिसे उन्होंने तीसरे दर्जे के डिब्बों में, गाँव की पगडंडियों पर, किसानों की झोंपड़ियों में देखा था। जिस दिन वो जहाज़ से उतरकर सीधे भाषण देने लगते, वो शायद एक और नेता होते। पर गोखले की उस एक सलाह ने, और उसके बाद गाँधी के अपने ज़िद्दी तरीक़े से उस सलाह को जीने ने, उन्हें महात्मा बनाया। यात्रा ने उन्हें सवाल पूछना सिखाया — कि नमक पर टैक्स क्यों, नील की जबरन खेती क्यों, तीसरे दर्जे में इतनी गंदगी क्यों। यात्रा ने उनका ईगो तोड़ा — फर्स्ट क्लास का बैरिस्टर तीसरे दर्जे में खिड़की से धकेला गया। और यात्रा ने ही उन्हें वो भाषा दी जो हर आम भारतीय समझ सके।

अपने लिए उदाहरण, इंस्पिरेशन, लर्निंग – सब बापू ही हैं! 150वां हैप्पी बर्थडे है आज! देसी ट्रैकिंग स्टिक लेकर पूरा इंडिया ट्रेक किएला है भाई बाप ने! और घूम घूम कर ही, क्या उधम मचाया! गांधी की यात्राओं में आपको सेल्फ़ एस्टीम का टूटना, बेसिक सवाल पूछना, गलत और सही को नई समझ देना, एक इन्फ्लुएंसर होना और ऐसी कई चीज़ें मिल जाएंगी जो अपनी यात्राओं पर हम आप भी एक्सपीरियंस करते हैं। जब तक ज़मीन पर उतरकर, असुविधा झेलकर, अजनबियों के बीच बैठकर किसी जगह को जिया नहीं जाता, तब तक उसे समझने का दावा अधूरा है। बापू यही सिखा गए — घूमो, पर ऐसे घूमो कि रास्ता तुम्हें बदल दे।

हमारे लिए तो बापू #travelgoals में आते हैं।

घूमो तो ऐसा घूमो!

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