भगत सिंह: वो क्रांतिकारी जो पढ़ाई, तर्क और इंसानियत से आज़ादी को समझते थे
गुरु भगत सिंह का मानना था कि आज़ादी बिना लड़े नहीं मिला करती, और आज़ादी की लड़ाइयां बिना बड़ी क्रांतियों के कुछ भी नहीं बल्कि एक स्वांग भर हैं — सत्ता का एक सौदा, जैसे कि अंग्रेजों के हाथों से निकलकर बड़े सेठों की जेबों में चले जाना।
भारत ने आज़ादी पाने के लिए मजबूरी में कई सौदे किए, और यही वजह थी कि भगत भारत की आज़ादी की लड़ाई को एक सिरे से नकारते थे। आज़ादी का मतलब न समझने और उसे हल्के में लेने के लिए वे क्रांतिवीरों और फ्रीडम फाइटर्स को टाइम टू टाइम लताड़ते भी थे। उनका मानना था कि बिना कुर्बानी के बीज के कोई क्रांति आ ही नहीं सकती — जैसे फ्रांस और रूस की क्रांतियां, जो ज़माने भर की कुर्बानियों पर खड़ी हुईं और आगे बढ़ीं। भारत की मिट्टी को भी एक ऐसे ही बीज की ज़रूरत थी, जो मिट्टी में मिले तो आज़ादी का हरा-भरा पेड़ बनकर उभरे। मंगल पांडे में भगत को उस बीज की एक चिंगारी दिखी थी। आज़ादी की अपनी थेओरी पर उन्हें इतना यकीन था कि भरी जवानी में उन्होंने ऐलान कर दिया — वे वो बीज हैं, जो आने वाली नस्लों की शक्ल में आज़ादी का पेड़ बनकर खड़े होंगे। जब तक सही मायनों में पूंजीपतियों, नेताओं और साम्राज्यवादियों से मुक्ति नहीं मिल जाती, आज़ादी सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण भर रहेगी — पैसे और पॉवर के लालच में, भ्रष्टाचार और धार्मिक अंधविश्वास के कीचड़ में सड़ती हुई, ठीक जैसे आज।
भगत का मानना था कि संपूर्ण आज़ादी पाने के लिए किसी भी देश को कम से कम बीस साल सीरियसली बड़ी ताकतों से लड़ना पड़ता है, जिसमें खून और पसीना दोनों बेहिसाब बहते हैं — नहीं तो आज़ादी के नाम पर बस एक गूंगा शब्द भर मिलता है।
लेकिन भगत को सिर्फ बंदूक और बम वाले क्रांतिकारी की तरह याद रखना उनके साथ सबसे बड़ी नाइंसाफी है। किसी भी क्रांतिकारी का पहला काम होता है पढ़ना — और भगत ने अपनी छोटी सी ज़िंदगी में इतना पढ़ा जितना बहुत से लोग पूरी उम्र में नहीं पढ़ पाते। पंद्रह साल की उम्र में लाहौर के नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया, जहाँ संस्कृत, उर्दू, हिंदी, पंजाबी और अंग्रेज़ी — सब भाषाओं से उनका रिश्ता जुड़ा। जेल में बिताए आखिरी दो सालों में उन्होंने चार किताबें लिखीं, जिनमें से सिर्फ एक — उनकी जेल नोटबुक (The Jail Notebook and Other Writings) — बच पाई। उसमें इतिहास, राजनीति, कानून, विज्ञान, साहित्य और दर्शन तक की झलक मिलती है। मार्क्स, लेनिन, बाकुनिन से लेकर आयरिश और रूसी क्रांतियों के साहित्य तक — सब कुछ उन्होंने चोरी-छिपे, बैन की हुई किताबों को स्मगल करवाकर पढ़ा। फांसी वाले दिन भी वे क्लारा ज़ेटकिन की लिखी लेनिन की जीवनी (Reminiscences of Lenin) पूरी करना चाहते थे — कहा जाता है कि उन्होंने अपने वकील से किताब मंगवाई थी। पढ़ाई उनके लिए दिखावा नहीं, बल्कि क्रांति की पहली शर्त थी — बिना पढ़े-लिखे इंसान न अपनी गुलामी को ठीक से समझ सकता है, न आज़ादी को।
इसी पढ़ने-लिखने की आदत ने उन्हें नास्तिक भी बनाया। “मैं नास्तिक क्यों हूँ” (Why I Am an Atheist) में भगत ने साफ लिखा कि उनकी नास्तिकता न घमंड से आई, न किसी क्रांतिकारी संगठन के दबाव से — बल्कि सोच-समझकर, तर्क से गुज़रकर आई। जो बच्चा घंटों गायत्री मंत्र जपा करता था, उसने बड़े होकर सवाल पूछना शुरू किया — अगर ईश्वर है तो दुनिया में इतनी गैर-बराबरी, इतना दुख क्यों? उनके लिए भगवान इंसान की कमज़ोरी का सहारा भर था, न कि सच्चाई। यही तर्कशीलता उन्हें जात-पात के सवाल तक भी ले गई — उन्होंने “अछूत का सवाल” (Achhut Ka Sawal) जैसे लेख लिखकर छुआछूत और जातिगत भेदभाव पर सीधा हमला किया। भगत के लिए आज़ादी सिर्फ अंग्रेज़ों के जाने का नाम नहीं थी — असली आज़ादी वो थी जो जात-पात, ऊंच-नीच और हर तरह के साम्राज्यवाद से मुक्ति दिलाए, चाहे वो गोरे साहब का हो या अपने ही समाज के भीतर के ठेकेदारों का।
फांसी से डेढ़ महीने पहले सुखदेव को लिखी उनकी चिट्ठी (Letter to Shaheed Sukhdev) भगत की एक बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाती है — नर्म, फ़िक्रमंद, गहराई से इंसानी। उसमें वे प्रेम पर बात करते हैं, इस बात पर कि क्रांतिकारी का प्रेम किसी एक इंसान तक सीमित नहीं रह सकता, वो व्यापक होना चाहिए, सार्वभौमिक। वे सुखदेव से कहते हैं कि ओवर-आइडियलिज़्म थोड़ा कम करो, जो साथी पीछे रह जाएंगे उनके साथ नरमी से पेश आना, उन्हें समझना — क्योंकि तकलीफ़ को समझे बिना कोई किसी का साथी नहीं बन सकता। यही भगत हैं जो एक तरफ बम फेंकने से नहीं हिचकते, और दूसरी तरफ जेल में साथी कैदियों के लिए भूख हड़ताल पर बैठ जाते हैं — सिर्फ इसलिए कि उन्हें बराबरी का सम्मान मिले। एक सौ सोलह दिन की भूख हड़ताल, जतिन दास की शहादत, कैदियों के लिए किताबें-अखबार-साफ पानी मांगना — यह वही इंसानियत है जो उनके लेखन में हर जगह झलकती है। जेल नोटबुक में शेक्सपियर और ग़ालिब दोनों के शेर दर्ज हैं — एक ऐसा दिल जो क्रांति जितनी शिद्दत से कविता, प्रकृति और इंसानी रिश्तों को भी महसूस करता था।
भारत के लोगों को आज़ादी के नए मायने समझाने वाले भगत को आज का सलाम। आज देशभर को उनके विचारों को ठीक से समझने की ज़्यादा ज़रूरत है। भगत सिंह के ख्यालों की बिजली आज भी देश की हवा में महक रही है। ज़रूरत बस इस बिजली को बड़े झटके में तब्दील करने की है, ताकि जो कोई इस देश को नोचने की कोशिश करे, उसको इस बिजली का झटका जोर से ही लगे। इसके लिए भगत की बातों पर गौर करते रहना चाहिए — जैसे उनकी यह बात, जो न जाने कब कही गई, आज भी उतनी ही रेलेवंट है:
“आज धार्मिक अंधविश्वास और कट्टरपंथ
हमारी प्रगति में बड़े बाधक हैं
वे हमारे रास्ते के रोड़े साबित हुए हैं
हमें इनसे हर हालत में
छुटकारा पा लेना चाहिए…
जो चीज़ आज़ाद विचारों को बर्दाश्त
नहीं कर सकती
उसे जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिए।”
— आपका भगत सिंह
एक सवाल आपके लिए भी छोड़ते हुए जाता हूं — अगर भगत आज ज़िंदा होते, तो आज की सरकार और आज की पब्लिक उन्हें किस नज़र से देखती? हीरो की तरह, या फिर एक “अर्बन नक्सल”, एक खतरनाक सवाल पूछने वाले नास्तिक की तरह? कमेंट में बताइए, आपकी नज़र में भगत आज कहाँ खड़े होते।


