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Tarsar Marsar Trek Guide — पहलगाम से आरू, कश्मीर का सबसे खूबसूरत झील-ट्रेक

Tarsar Lake on Tarsar Marsar Trek
तारसर मारसर लेक्स ट्रेक : कश्मीर के दो आंसू, जो कभी सूखते नहीं

कुछ ट्रेक्स आप प्लान करते हो। और कुछ ट्रेक्स आपको बुला लेते हैं, बिना बताए कि क्यों। तारसर मारसर ट्रेक हमारे लिए दूसरी कैटेगरी में था। नाम सुना था, फोटोज़ देखी थीं, पर जब हम आरू वैली के उस आखिरी चाय के टपरी पे खड़े थे, सामने कोलाहोई की चोटियां देख के, तब जाके पता चला कि यह ट्रेक सिर्फ दो लेक्स तक पहुंचने का रास्ता नहीं है — यह कश्मीर के सबसे कच्चे, सबसे ईमानदार हिस्से से गुज़रने का मौका है।

इस गाइड में हम वही लिख रहे हैं जो हमने खुद जिया — पहलगाम में बेस बनाने से लेकर, आरू के लोकल गाइड के साथ अपना खुद का ट्रेक प्लान करने तक, और फिर उन दिनों के लिए जिनमें हम लिद्दरवट के मैदानों से होते हुए सुंदरसर की धुंध तक पहुंचे। अगर आप भी तारसर मारसर ट्रेक को सोच रहे हो — चाहे कॉर्पोरेट ग्रुप के साथ या अपने दम पे — यह पोस्ट आपके काम आएगी।

पहलगाम: सिर्फ एक पिट-स्टॉप नहीं, एक पूरा एडजस्टमेंट पॉइंट

ज़्यादातर लोग पहलगाम को सिर्फ “ट्रेक का बेस कैंप” समझ के निकल जाते हैं। हमारी सलाह है — मत जल्दी करो। पहलगाम खुद में एक छोटी दुनिया है, और एक दिन यहां बिताना सिर्फ एक्लिमेटाइज़ेशन के लिए नहीं, दिल को वहां की हवा से दोस्ती करवाने के लिए ज़रूरी है।

हम जम्मू से ओवरनाइट कैब लेकर खानाबल पहुंचे, वहां से लोकल सूमो पकड़ी पहलगाम के लिए। पहलगाम में हमारा ठिकाना था। मीर भाई जी का गेस्टहाउस, लारीपोरा में — पहली रात वहीं आराम से रुकना, कुछ मत करना। हाइट का फर्क बॉडी को चुपके से पकड़ लेता है अगर आप उसे वक्त नहीं दोगे। मीर भाई जी की मेहमाननवाज़ी और उनकी कश्मीरी कहवा वाली चाय ने पहली शाम को ही घर जैसा बना दिया था।

अगले दिन हमने दो जगह कवर कीं जो पहलगाम से मुश्किल से 5-6 किमी दूर हैं, पर माहौल खुद पूरा अलग:

बेताब वैली — नाम बॉलीवुड की वजह से पड़ा है, पर वैली खुद किसी फिल्म से कम नहीं। रोड से कनेक्टेड है, तो कैब या शेयर्ड सूमो में आसानी से पहुंच जाओगे। यहां का पाइन फॉरेस्ट और बीच में बहता पानी, सुबह की हल्की धूप में बहुत सुकून देता है। ज़्यादा वक्त लगता नहीं, एक दो घंटे काफी हैं।

बैसरन वैली — इसे लोग “मिनी स्विट्ज़रलैंड” बुलाते हैं, जो थोड़ा ओवरयूज़्ड टाइटल लगता है जब तक आप खुद वहां नहीं पहुंचते। 6 किमी का ग्रैवल रोड और ट्रेल है — पोनी भी मिलते हैं अगर वॉक नहीं करना। ऊपर पहुंच के जो खुला मैदान मिलता है, पाइन ट्रीज़ से घिरा हुआ, वहां बैठ के हमने अपना पहला रियल “इस ट्रिप के लिए रेडी हैं” वाला मोमेंट महसूस किया।

अगर टाइम हो तो तूलियन लेक ट्रेक (21 किमी, थोड़ा सीरियस कमिटमेंट) या बैसर लेक भी एक्सप्लोर कर सकते हो, पर हमने अपनी एनर्जी तारसर मारसर के लिए बचा के रखी।

रात को वापस पहलगाम, पैकिंग डबल-चेक, और अगली सुबह सीधा आरू के लिए निकल गए।

वह हैक जो कॉर्पोरेट ग्रुप्स नहीं बताते

यहां एक ईमानदार बात करते हैं। बड़ी ट्रेकिंग कंपनियां — जैसे इंडियाहाइक्स और इनके जैसे अन्य — तारसर मारसर ट्रेक को 5 से 7 दिन का पैकेज बेचती हैं, जिसमें फिक्स्ड डेट्स, फिक्स्ड गाइड्स, और एक अच्छा खासा प्राइस टैग होता है। और वह गलत भी नहीं है — उन लोगों के साथ स्ट्रक्चर, सेफ्टी नेट, और लॉजिस्टिक्स का कम्फर्ट मिलता है।

पर अगर आप थोड़े एडवेंचरस हो और अपना टाइम खुद मैनेज कर सकते हो, तो असली हैक यह है: पहलगाम पहुंच जाओ, आरू वैली तक खुद का ट्रांसपोर्ट लो, और वहां से लोकल गाइड और घोड़े (पोनी) हायर कर लो। आरू में ही काफी लोग मिलेंगे जो सालों से यही ट्रेल चलते आ रहे हैं — उनके पास नक्शा नहीं होगा, पर उनकी पैरों में ट्रेल की हर मोड़ याद है।

हमारे ट्रेक लीडर थे जुनैद भाई — मीर भाई जी के जानने वाले, आरू के ही रहने वाले। जिस भरोसे और सहजता से उन्होंने हमें ट्रेल पे लीड किया, वो किसी बड़ी कंपनी के ब्रोशर में नहीं मिलता। और हमारे साथ था हमारा सामान ढोने वाला साथी — एक पोनी जिसका नाम था बामरू। तीन दिन के इस सफर में बामरू हमारे कारवां का उतना ही हिस्सा बन गया जितना कोई इंसान — हर स्ट्रीम क्रॉसिंग पे उसकी वो अड़ियल अदा, और हर कैंप पे पहुंच के उसका सुकून से घास चरना, अब भी याद है।

एक ईमानदार नोट यहां देना ज़रूरी है — हमने खुद यह पूरा ट्रेक, आरू से आरू, सिर्फ 3 दिनों में जुनैद भाई और बामरू के साथ पूरा किया था। फिट थे, मौसम साथ दे रहा था, और हमें आगे की कोई और यात्रा भी जोड़नी थी, तो हमने पेस तेज़ रखा। पर हम खुद यह रिकमेंड नहीं करेंगे कि हर कोई ऐसे ही करे। अगर आपके पास टाइम की गुंजाइश है, तो 4 से 5 दिन ज़रूर दें — इस ट्रेक को जल्दी में निपटाना उसके साथ नाइंसाफी करना है। तारसर के किनारे एक ठहरी हुई शाम, सुंदरसर के पास वो चुप्पी जो सिर्फ हवा तोड़ती है — इन पलों को जल्दी में जीना और धीरे-धीरे जीना, बिल्कुल अलग अनुभव हैं। कश्मीर की यह वाली फीलिंग एक बार में, भागते हुए नहीं आती।

तारसर मारसर ट्रेक स्नैपशॉट

कुल दूरी: 50-55 किमी

– कठिनाई: आसान से मध्यम

– अवधि: 6-7 दिन (कॉर्पोरेट/हाइकिंग ग्रुप्स के साथ) या 3 दिन 2 रात में भी हो सकता है (हमारा अनुभव), पर 4-5 दिन रिकमेंड करते हैं अगर जल्दी नहीं है

– बेस्ट टाइम: मई से सितंबर स्टार्ट

– तापमान: दिन में मैक्स 20°C, रात को सब-ज़ीरो तक

– ऊंचाई सीमा: 2700मी से 4000मी

– स्टार्ट पॉइंट: आरू

– ट्रेक टाइप: सर्किट — ट्रेल पूरा क्लीन है, मिट्टी, बोल्डर्स, चढ़ाइयां, खुले मैदान, चौड़ी धाराएं, और रिज क्रॉसिंग्स का मिक्स

दिन 1: आरू से लिद्दरवट — कोलाहोई का पहला दर्शन

दूरी यहां करीब 10 किमी है, और यह ट्रेक का सबसे जेंटल वार्म-अप है। ट्रेल के साथ छोटी रिवरलेट्स चलती रहती हैं, और बीच बीच में बकरवाल फैमिलीज़ के अड्डे मिलते हैं — अगर थोड़ी बातचीत कर लो, तो चाय भी मिल जाती है, उनकी दूध वाली गरम चाय जो इस ठंडी हवा में किसी नेमत से कम नहीं लगती।

कुछ देर बाद जब पेड़ क्लियर होने लगते हैं, कोलाहोई पीक दूर से दिखना शुरू होती है — पहली बार देखोगे तो रुक जाओगे, कसम से। लिद्दरवट खुद एक विशाल कैंपिंग एरिया है नदी किनारे, जहां PWD रेस्ट हाउस और छोटी टपरी चाय शॉप्स भी मिलती हैं जो सीज़न में ज़रूरी चीज़ें रखते हैं। यहां रात रुकना, थकान उतारना, और अगले दिन के लिए एनर्जी जमा करना।

दिन 2: लिद्दरवट से शेखवास — खाली वैली की खामोशी

यह सेक्शन करीब 9 किमी का है, और यहां से ट्रेल थोड़ा ज़्यादा “वाइल्ड” महसूस होने लगता है। शेखवास भी नदी किनारे कैंपिंग एरिया है, एक विशाल वैली में, और यहां आस पास बकरवाल अड्डे तो मिलेंगे, पर शॉप्स नहीं — तो अपना राशन यहां तक ध्यान से प्लान करके रखना।

यह दिन का सबसे खास हिस्सा उसकी सिंप्लिसिटी है। कोई शॉप नहीं, कोई नॉइज़ नहीं, सिर्फ पानी की आवाज़, हवा, और दूर कहीं किसी भेड़ की घंटी। रात को आसमान देखना मत भूलना — यहां लाइट पॉल्यूशन ज़ीरो के बराबर है।

दिन 3: शेखवास से तारसर — जहां लेक पहली बार दिखता है

दूरी सिर्फ 6 किमी है, पर यह मत समझो कि आसान होगा। ग्रैजुअल इंक्लाइन, छोटी छोटी क्लाइम्ब्स, बोल्डर्स, और स्ट्रीम्स क्रॉस करने पड़ते हैं। पर जब **तारसर लेक** पहली बार दिखता है — उस गहरे नीले पानी का, ग्लेशियर वॉल्स से घिरे — सब थकान भूल जाते हो।

यह हाई एल्टीट्यूड एरिया है, तो तापमान रात को फ्रीज़िंग तक चला जाता है, और विंड भी काफी तेज़ चलती है। कैंप लेक के पास ही लगेगा, सो प्रॉपर लेयरिंग कैरी करना ज़रूरी है — यह एरिया माफ नहीं करता अगर तुम अंडरप्रिपेयर्ड आए हो।

दिन 4: तारसर से सुंदरसर कैंपिंग एरिया — रिज के उस पार

6 से 7 किमी का यह स्ट्रेच ट्रेक का सबसे ड्रामेटिक हिस्सा है। एक हाई रिज क्रॉस करनी पड़ती है, जिसके बाद एक विशाल, खुला वैली खुलता है सामने। ज़्यादातर लोग **सुंदरसर लेक** के पास नहीं, उसके थोड़ा पहले ही कैंप करते हैं — क्योंकि लेक के बिल्कुल किनारे रात बिताना बहुत ज़्यादा ठंडा हो जाता है उन हाइट्स पे।

यह कैंप फाइनल क्लाइम्ब से पहले का आखिरी पड़ाव है, और इस रात की थकान में एक सैटिस्फैक्शन होता है कि कल, दो लेक्स एक साथ देखने वाले हो।

दिन 5: सुंदरसर और मारसर — वह पॉइंट जहां ट्रेक अपना असली मतलब देता है

3 से 4 किमी का यह छोटा पर इंटेंस हिस्सा है। कैंपिंग एरिया से सुंदरसर तक क्लाइम्ब, वहां कुछ वक्त बिताओ, और फिर मारसर के लिए कंटिन्यू करो। बीच में छोटी रिज क्रॉसिंग्स और बड़े बोल्डर्स मिलेंगे, पर जब आखिरी पॉइंट से मारसर लेक पहली बार दिखता है — कोई शब्द काफी नहीं है उसको डिस्क्राइब करने के लिए। इंटरेस्टिंग बात यह है कि मारसर लेक पर कैंपिंग अलाउड नहीं है — सिर्फ देख के वापस अपने कैंप लौटना पड़ता है।

तारसर-मारसर नाम के पीछे की लोक कथा

जुनैद भाई ने हमें रास्ते में एक कहानी सुनाई थी जो शायद ट्रेक की सबसे खूबसूरत चीज़ों में से एक है — इन दोनों झीलों के नाम की कहानी। कहते हैं कि बहुत साल पहले एक बकरवाल इस इलाके में अपनी भैंसों को चरा रहा था। उसकी कुछ भैंसें भटकते हुए तारसर की तरफ के पानी में उतर गईं, और कुछ देर बाद सही सलामत वापस निकल आईं — जैसे पानी ने उन्हें “तार” दिया हो। यहीं से नाम पड़ा तार-सर, जहां हिंदी की मशहूर कहावत वाला “तर जाना” काम आता है।

पर दूसरी तरफ, जब कुछ भैंसें उसी तरह मारसर की तरफ के पानी में गईं, तो वो वापस नहीं आईं — पानी ने उन्हें “मार” दिया। इसीलिए नाम पड़ा मार-सर। कश्मीरी भाषा में “सर” का मतलब झील होता है, तो तार-सर और मार-सर — दोनों नाम इसी लोक कथा से निकले हैं।

स्थानीय लोग मानते हैं कि यही वजह है कि तारसर के किनारे कैंपिंग की जाती है, पर मारसर के पानी के करीब रात बिताना आज भी अवॉइड किया जाता है — चाहे वो सिर्फ एक मान्यता ही क्यों ना हो, पर उस ऊंचाई पे, उस खामोशी में, यह कहानी सुनना अपने आप में एक अलग एहसास देता है।

इसी दिन वापसी भी शुरू होती है: मारसर से सुंदरसर, फिर कैंपिंग एरिया, होमवास, शेखवास, लिद्दरवट, और फाइनली आरू वैली — जहां से यह सफर शुरू हुआ था।

आस-पास की झीलें और पॉइंट्स — अगर आपके पास एक्स्ट्रा दिन हों

तारसर मारसर ट्रेक अपने आप में मुकम्मल है, पर अगर आपके पास वक्त और एनर्जी बची है, तो इस रीजन में कुछ और जगहें हैं जो एक्सप्लोर की जा सकती हैं:

  • कोलाहोई ग्लेशियर व्यू पॉइंट — लिद्दरवट से ही कोलाहोई पीक साफ दिखनी शुरू हो जाती है, और अगर एक एक्स्ट्रा दिन निकाल सको, तो ग्लेशियर के करीब जाने वाला साइड ट्रेल भी लिया जा सकता है। सीरियस माउंटेनियर्स के लिए यह एक अलग ही अट्रैक्शन है।
  • सोनमर्ग (Sonmarg) कनेक्शन — मारसर लेक से सोनमर्ग सिर्फ 20 किमी की दूरी पे है, सोनमस्ती पास (Sonmasti Pass) के रास्ते से। यह रूट टेक्निकल है और सबके लिए नहीं, पर अनुभवी ट्रेकर्स इसे सिंध वैली से आरू तक के क्रॉस-ओवर ट्रेक के तौर पे भी करते हैं।
  • दाचीगाम नेशनल पार्क का किनारा — मारसर लेक के दाईं तरफ दाचीगाम रिज़र्व फॉरेस्ट का बॉर्डर लगभग छूता है। यह हंगुल डियर (कश्मीरी स्टैग) के लिए फेमस प्रोटेक्टेड एरिया है, हालांकि ट्रेक रूट से सीधा एंट्री नहीं मिलती।
  • तूलियन लेक — अगर पहलगाम से ही एक अलग डे-ट्रेक करना हो (21 किमी अप-डाउन), तो यह भी उसी बेल्ट का हिस्सा है और शॉर्ट टाइम में हाई-एल्टीट्यूड लेक एक्सपीरियंस देता है।
  • लिद्दर वैली की छोटी साइड ट्रेल्स — लिद्दरवट और शेखवास के बीच कई छोटे अनऑफिशियल ट्रेल्स हैं जो बकरवाल परिवार इस्तेमाल करते हैं। अकेले एक्सप्लोर मत करना, पर अगर गाइड साथ हो तो पूछ के देख सकते हो।

कुछ बातें जो हमने ट्रेल पे सीखीं

दिल्ली/जम्मू से: ट्रेनें और बसें रात भर चलती हैं, फेयर 500-700 स्लीपर, 1000-1100 बस में।

जम्मू से पहलगाम: शेयर्ड/प्राइवेट SUVs, ड्रॉप पॉइंट खानाबल (श्रीनगर से 120 किमी पहले), फेयर 800-1000/सीट, जर्नी 5-6 घंटे।

खानाबल से पहलगाम: शेयर्ड कैब्स, 30-50 रुपये, 2 घंटे मैक्स।

पहलगाम से आरू वैली: हर 15-20 मिनट में शेयर्ड/प्राइवेट कैब्स मिलते हैं पहलगाम टैक्सी स्टैंड से, फेयर 15-20 रुपये पर पर्सन।

कॉन्टैक्ट फॉर स्टे और ट्रेक अरेंजमेंट:

मीर गेस्ट हाउस, लारीपोरा, पहलगाम

मीर भाई जी (होमस्टे) — 9622502805

जुनैद भाई (ट्रेक लीडर) — 7006082059

तारसर मारसर ट्रेक आपको कोई बड़ा एड्रेनालिन रश नहीं देगा — कोई स्टीप समिट पुश नहीं है यहां। पर जो यह देता है, वो शायद उससे ज़्यादा रेयर है: दो झीलें जो अपनी जगह पे बिल्कुल चुप, बिल्कुल स्थिर खड़ी हैं, जबकि पूरी दुनिया उन तक पहुंचने के लिए बदल रही है। जुनैद भाई की रहनुमाई में, बामरू के साथ कदम मिलाते हुए, हमने यह जो सीखा — वो किसी ब्रोशर में नहीं मिलता। अगर आप हिमालय से सच में कुछ सीखना चाहते हो, तो यह ट्रेक उसका एक शांत, ईमानदार सबक है।

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