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नॉर्थईस्ट भारत से पहली मुलाक़ात | असम, नागालैंड, मेघालय ट्रैवलॉग

A group of travellers in Meghalaya
नॉर्थईस्ट भारत से पहली मुलाक़ात

नॉर्थईस्ट भारत से पहली मुलाक़ात – प्रस्तावना

अगर हम कहें कि बाहर कहीं ऐसा भी एक जहाँ है जहाँ आकाश में सिर्फ़ सूरज का सिक्का चलता है। तो मानेंगे आप?

आसमान उसका पर्सनल कैन्वस है वहाँ, जिसपर वो आते-जाते अपनी कलाकारी करता है।

बादलों को भी वो साथ में लपेट लेता है, वो भी उसके रंगों पर नाचते नज़र आते हैं। भाई साब, कमाल का माहौल बनता है। हर रोज़ दिन में दो बार सारा समाँ रंगा होता है।

सूरज जब सुबह निकलता है तो तारों को रोशनी में धूमिल करता नए दिन का आग़ाज़ करता है और शाम को विदाई लेते समय आसमान पर नक़्क़ाशी करता दिखता है।

सूर्योदय और सूर्यास्त का अपना-अपना एक पहर है वहाँ। सुबह और शामें लम्बी होती हैं। बैठकर देखो तो सिर्फ़ सनराइज़-सनसेट वाली जादुई दुनिया एकदम असलियत लगती है।

इसी जादुई दुनिया की ओर रुख़ करते हैं और चलते हैं भारत के नॉर्थईस्ट स्टेट्स – असम, नागालैंड और मेघालय की ओर – जहाँ सूरज जल्दी उगता है। इस पोस्ट में आपसे अपनी नॉर्थईस्ट की 10 दिन की पूरी आयटिनरेरी शेयर करेंगे। जिन जगहों पर गए वहाँ की इन्फ़र्मेशन भी रहेगी ताकि आप अगर जाने का मन बनाएँ तो ज़रूर जाएँ।

बाक़ी जो हमको दिखा और जो हमने ट्रिप पर किया, जो हमारा ‘दर्शन’ हुआ, वो तो आपसे बख़ूबी शेयर करते रहेंगे।

देखिए दोस्तों, सीन ये है कि हम हैं भारत के नॉर्थईस्ट में और यहाँ पहला दिन बिताया है। क़सम से कह रहे हैं, हम यहाँ चीज़ों पर यक़ीन नहीं कर पा रहे। जगह को देखकर यक़ीन नहीं हो पा रहा कि इतना सुंदर भी कुछ हो सकता है, और फिर गाँव के लोग तो होते ही बेमिसाल हैं।

और जैसे सुंदरता की सबसे पहली ख़ूबी उसका सादापन होती है, वैसा ही कुछ देख रहे हैं यहाँ।

दूसरा ये भी कि पहले ही दिन 24 घंटों में हम ट्रैवलिंग के तीनों तरीक़ों से ट्रैवल कर चुके थे। दिल्ली से गुवाहाटी की यात्रा रही हवाई – हवाईजहाज़ से।फिर गुवाहाटी से आए हम अपनी गाड़ी से। पहुँचे हैं हम असम के माजुली में जो कि एक द्वीप/टापू है – ठीक ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में कहीं। तो यहाँ पहुँचने के लिए हमको फ़ेरी लेनी पड़ी और नदी के रास्ते आए।

पहला दिन। दिल्ली से गुवाहाटी।

तो हमारे नॉर्थईस्ट ट्रिप की शुरुआत हुई गुवाहाटी से। अगर आप भारत के नक़्शे में असम को देखेंगे, तो आपको मिलेगा कि यह नॉर्थईस्ट इंडिया के सेवन सिस्टर स्टेट्स के एकदम केंद्र में है। असम के ठीक ऊपर आपको अरुणाचल प्रदेश, दाएँ तरफ़ नीचे नागालैंड, मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा तो बाएँ तरफ़ नीचे मेघालय दिखेगा। गुवाहाटी बाक़ी सभी राज्यों से वेल कनेक्टेड भी है। यहाँ पहुँचने के लिए आपको ट्रांसपोर्ट के काफ़ी ऑप्शन मिल जाएँगे, और फिर यहाँ से आगे दूसरे नॉर्थईस्ट स्टेट्स तक आसानी से जाया जा सकता है। मतलब गुवाहाटी को आप नॉर्थईस्ट ट्रिप के लिए स्टार्टिंग पॉइंट की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। वही हमने किया।

इस ट्रिप की एक ख़ास बात यह भी रही कि इस बार हमने यातायात के लगभग सभी माध्यमों से ट्रैवल किया – ट्रेन, हवाईजहाज़, गाड़ी और नाव, सबके स्वाद लिए। दिल्ली से गुवाहाटी तक हमने हवाई यात्रा की। मौसम साफ़ था तो हवा में ऊपर उठते ही हिमालय की शृंखलाओं के दर्शन हो गए। नीचे बादल थे और बादलों से झाँकती ग्रेटर हिमालय की ऊँची चोटियाँ। लगा कि हिमालय के लिए हमारी यात्रा दिल्ली से ही शुरू हो गई हो – ये बात अलग है कि इस बार हम हिमालय के पूर्वी छोर की तरफ़ बढ़ रहे थे।

पूर्वोत्तर में हिमालय की पहाड़ियाँ छोटी और फैली हुई हैं। ये सभी पहाड़ियाँ वर्षा-वनों से ढकी हुई हैं। इन पहाड़ियों के बीच आपको खुले मैदान दिखेंगे जो दिसंबर में कुछ जगह पानी से तो बाक़ी जगह धान के खेतों से भरे, हरे-पीले दिखेंगे। खेतों के आसपास छोटे क़स्बे और सुपारी के पेड़ों की भरमार मिलेगी।

गुवाहाटी के क़रीब पहुँचते ही दर्शन हुए ब्रह्मपुत्र के। ब्रह्मपुत्र नदी असम की पहचान है, उसके अस्तित्व का बहुत बड़ा हिस्सा है। ब्रह्मपुत्र की ही वजह से असम को धान, बाँस और मछलियों की अनेकों प्रजातियाँ मिलती हैं। हालाँकि हर साल असम को बाढ़ से सबसे ज़्यादा नुक़सान भी यही नदी पहुँचाती है। पर क्या करें, यही क़ुदरत का खेल है।

गुवाहाटी ख़ुद भी एक ऐसा शहर है जो अपने आप में असम की पूरी पहचान समेटे हुए है। यहाँ की भाषा असमिया है – बांग्ला और संस्कृत से जुड़ी हुई एक मीठी बोली, जिसमें सड़क पर होने वाली आम बातचीत भी किसी गीत जैसी सुनाई देती है। शहर के बीचोंबीच बहती ब्रह्मपुत्र में उमानंद जैसा छोटा-सा टापू भी है, और पहाड़ी पर बना कामाख्या मंदिर – जो शक्तिपीठों में गिना जाता है और तंत्र-परंपरा का बड़ा केंद्र भी रहा है। असम की पहचान सिर्फ़ चाय के बाग़ानों तक सीमित नहीं, यहाँ का बिहू नृत्य, मूगा सिल्क की बुनाई और नदी किनारे बसी ज़िंदगी – सब मिलकर इस राज्य की सांस्कृतिक तस्वीर बनाते हैं, जिसकी हल्की-सी झलक हमें गुवाहाटी में ही मिलनी शुरू हो गई थी।

दोपहर हम दिल्ली से चले और शाम को हम गुवाहाटी थे। शाम वहीं शहर में बिताकर रात हमने काटी दोस्त के घर। प्लान था अगली सुबह तड़के निकलने का, आगे काफ़ी लंबा रास्ता हमारा इंतज़ार कर रहा था। ट्रिप का अगला पड़ाव कहाँ का था, वो अगली पोस्ट में बताएँगे। नॉर्थईस्ट भारत के बारे में अगर कुछ सवाल ज़हन में हैं तो आप बिना किसी हिचकिचाहट के कमेंट सेक्शन में पूछ सकते हैं।

दूसरा दिन। गुवाहाटी से माजुली द्वीप तक।

ट्रिप के दूसरे दिन को आप पहला भी कह सकते हैं, क्यूँकि पिछली शाम तो गुवाहाटी पहुँचे ही थे। बीच में बस एक रात गुज़री और फिर अगली सुबह 6 बजे हम रेडी थे अपनी गाड़ी में आगे निकलने के लिए।

ट्रिप की पहली डेस्टिनेशन रखी हमने माजुली द्वीप, असम में ही है। गुवाहाटी से क़रीब 345 किलोमीटर दूर, ब्रह्मपुत्र नदी पर। यह दुनिया के सबसे बड़े नदी-टापुओं में से एक है। गुवाहाटी से माजुली तक का रास्ता ब्रह्मपुत्र नदी के ठीक पैरलेल चलता है और आप पूर्व की ओर बढ़ते हैं।

रास्ता लंबा है पर बहुत बहारदार है। और हम भी असम को पहली दफ़ा देख रहे थे तो अगल-बग़ल रास्ते से आँखें चुराना मुश्किल था। फिर रास्ते में काज़ीरंगा नैशनल पार्क भी आता है, वहाँ रुकना भी बनता है। काज़ीरंगा दुनिया में एक-सींग वाले गैंडों (one-horned rhinoceros) की सबसे बड़ी आबादी के लिए जाना जाता है, और यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट भी है। ब्रह्मपुत्र के दलदली मैदान, ऊँची हाथी घास और घने जंगल मिलकर यहाँ एक ऐसा इकोसिस्टम बनाते हैं जो गैंडों के अलावा बाघ, हाथी और जंगली भैंसों को भी पनाह देता है। वन और वन्य जीवन के साथ आदमी अपनी दुनिया कैसे चला सकता है, आपको यहाँ दिखता है। सफ़र का पहला हॉल्ट हमने यहीं लिया और नाश्ता किया।

माजुली के लिए एक रास्ता तेज़पुर साइड से भी है, पर वो बहुत लंबा पड़ता है। जो छोटा और मेन रास्ता है वो जोरहाट से आता है। जोरहाट छोटा-सा टाउन है, यहाँ से आप ब्रह्मपुत्र पर बने नीमती घाट पर आते हैं – यहाँ सड़क का रास्ता ख़त्म हो जाता है। नीमती घाट से माजुली तक फ़ेरी लेनी होती है। फ़ेरी आपको माजुली में बने कमलाबाड़ी फ़ेरी पॉइंट पर उतारती है। 20 किलोमीटर का डिस्टेंस है, 1 घंटे से ऊपर लग जाता है।

गाड़ी हो या आदमी, या कोई सामान – सब का सब फ़ेरी से ही टापू पर पहुँचता है। पर एक बात ध्यान रखने की है कि जोरहाट से माजुली के लिए आख़िरी फ़ेरी 3 बजे चलती है, अगर ये मिस की तो फिर आप अगले दिन का वेट कीजिए। तो हमको तो रात जोरहाट में नहीं बितानी थी इसलिए हम सुबह जल्दी निकले थे, और 2 बजे जोरहाट पहुँच गए थे।

अब नॉर्थईस्ट की एक बहुत ख़ास बात ये भी है कि यहाँ सुबह सूरज बड़ी जल्दी आता है और जितनी जल्दी आता है उतनी ही जल्दी चला भी जाता है। कमलाबाड़ी घाट पर उतरकर माजुली में दाख़िल ही हुए थे कि सूरज हमें जाता दिखा। ऐसे सनसेट को कैसे मिस कर सकते थे, तो कुछ देर वहीं रुके। अँधेरा होते-होते हम कमलाबाड़ी मार्केट पहुँच गए थे। टेंट लगाने का समय नहीं था तो हमने वहीं एक होमस्टे देखा और वहीं रुके।

पहली रात हमने वहीं बिताई। डिनर में असामी थाली खाई और फिर फैलकर सो गए। अगले दिन सनराइज़ से पहले ही माजुली देखने का सीन था।

तीसरा दिन। माजुली द्वीप की पहली सुबह।

बोलकर देखें तो ‘माजुली’ शब्द ‘मझले’ के काफ़ी क़रीब सुनाई पड़ता है। ‘मझले’ का मतलब है कोई भी वो चीज़ जो बीच की हो या किन्हीं दो चीज़ों के बीच में हो। ऐसी ही कुछ स्थिति है माजुली की – तैरता हुआ नदी का टापू है ब्रह्मपुत्र नदी के ठीक बीच में।

नक़्शे पर देखेंगे तो माजुली द्वीप के दक्षिण में आपको ब्रह्मपुत्र नदी और उत्तर में खेरकुटिया खूटी नाम की धारा दिखेगी। खेरकुटिया खूटी ब्रह्मपुत्र नदी से निकलती है और आगे चलकर फिर उसी में मिल जाती है। यही कारण भी है माजुली द्वीप के अस्तित्व में आने का – पुराने समय में कभी ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों, ख़ासकर लोहित नदी के दिशा और जगह बदलने की वजह से बना था यह टापू।

यहाँ के लोगों और उनकी जीवनशैली की वजह से इसे असम की सांस्कृतिक राजधानी भी कहते हैं। एकदम निराली दुनिया है यहाँ की, जिसका अपना इतिहास, कल्चर और अपनी सभ्यता रही है, जिसको यहाँ के लोगों ने अपनी ज़िंदगी दाँव पर लगाकर बचा रखा है।

जीओग्राफ़िकली और सोशली दोनों ही तरीक़ों से ये जगह एहसास कराती है कि आप एक अलग दुनिया में हैं यहाँ, जो बाक़ी सारी दुनिया से कटी हुई है और दूर है। एक छोटी-सी दुनिया जो अपने आप में बहुत बड़ी है, और आप इसमें झाँकेंगे तो ये आपको भी समेट लेती है। आप भूल जाते हैं बाक़ी सब यहाँ आकर।

तो जी, पिछली शाम हम तो पहुँचे इस फ़्लोटिंग आयलंड पर जो दुनिया का एकमात्र फ़्लोटिंग डिस्ट्रिक्ट भी है।

अभी तक ज़्यादा घूमे नहीं थे, ना ही लोगों से मिल पाए थे। सुबह का प्लान ये था कि जितना जल्दी हो सके उठें और सूरज उगने से पहले कोई मस्त-सा सनराइज़ पॉइंट ढूँढें। नॉर्थईस्ट में सुबह जल्दी होती है तो हम लोग सुबह 5 बजने में पंद्रह मिनट पहले ही निकल लिए। जगह के बारे में नहीं पता था तो दिमाग़ लगाया कि तट पर चला जाए, नदी के किनारे।

जहाँ हम रुके थे वहाँ से कमलाबाड़ी घाट ज़्यादा दूर नहीं था। फटाफट पहुँचे और किनारे खड़ी एक बड़ी-सी नाव पर बैठ उगते सूरज को निहारने लगे। बेस्ट सनराइज़ तो पता नहीं, पर ज़िंदगी भर जिसे ना भूल पाएँगे ऐसी एक सुबह देखी। फिर वहीं घाट पर टपरी से चाय पी और कुछ देर वहीं रुके।

बेमिसाल दुनिया है माजुली की। पर अगर हम कहें कि अगले 10-15 सालों में यह जगह दुनिया से ग़ायब हो जाएगी तो मानेंगे आप?

नहीं ना। हम भी विश्वास नहीं कर पा रहे थे। पर सच्चाई यही है।

तीसरा ही दिन। माजुली द्वीप की सैर।

सनराइज़ का लुत्फ़ उठाकर, अब हम वापस निकले अपने ठिकाने की ओर। एक तो हमें दिन भर के लिए सभी इंस्ट्रुमेंट चार्ज करने थे, और उससे पहले करनी थी पेट पूजा। 7:30 बजे तक हम वापस माजुली मार्केट पहुँच गए। एक मिठाई की दुकान में पूड़ी और आलू की सब्ज़ी मिल रही थी – हमने चाय के साथ लपेट दी। फिर होमस्टे पहुँचकर सब चार्ज किया, नहाए-धोए और रूम ख़ाली कर निकल लिए माजुली की सैर करने।

बात आप किसी जगह की करें या इंसान की, आप एक बार में किसी को पूरी तरह नहीं जान सकते। तो हमारा इरादा अलग था – कोशिश बस ये थी कि उत्तर-पूर्व भारत से जो मुलाक़ात हो रही थी वो जितनी हो सके उतनी लंबी हो। ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से मिलें और उनके साथ बैठें, बातें करें।

माजुली को जानने की बात करें तो इसके इतिहास की कहानी लंबी है। यहाँ पर सबसे ज़्यादा रहने वाले – मिसिंग, देउरी और सोनोवाल-कछारी जाति के लोग 7वीं शताब्दी में बर्मा (म्यांमार) से चलकर अरुणाचल होते हुए यहाँ आए थे। और फिर यहीं अपने गाँव और क़स्बे बनाकर रहने लगे। इन ट्राइब्ज़ के अलावा कुछ और असमिया जाति-जनजातियों के लोग रहते हैं, पर वे कम हैं।

भारत के और गाँवों की तरह यहाँ के लोगों का मेन व्यवसाय कृषि है। सौ से ज़्यादा टाइप के धान/चावल की फ़सलों की बुआई होती है। पर साल में बस एक बार ही खेती होती है क्यूँकि गर्मियों में तो सब पानी से टापा होता है। इसके अलावा मछली पालन, नाव बनाना, शिल्पकारी और मिट्टी के बर्तन व मुखौटे बनाना भी यहाँ के लोगों को अच्छे से आता है। नदी के किनारे बसे होने से ये लोग पैदाइशी तैराक और मछवारे होते हैं। मिसिंग औरतें माहिर शिल्पकार होती हैं और अपने कपड़े ख़ुद बुनती हैं।

बाँस का इस्तेमाल ये लोग खाने, खाना बनाने, जलाने और घर बनाने में करते हैं। घर की दीवार, दरवाज़े, फ़र्श सभी बाँस के बने होते हैं और छत फूस की। हवा और बारिश से बचाने के लिए दीवारों को मिट्टी और गोबर से लीप दिया जाता है। सभी घर ज़मीन से 3-4 फ़ीट ऊपर बाँस की बल्लियों पर टिके होते हैं ताकि अचानक आई बाढ़ से बचा जा सके।

नदी से होने वाली परेशानियों को ये लोग अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना चुके हैं। पर परेशानियों के अलावा माजुली एक अलग समस्या से जूझ रहा है। साल-दर-साल मिट्टी के कटाव से माजुली का साइज़ छोटा होता जा रहा है। और वो दिन दूर नहीं जब यहाँ रहने को जगह ना होगी और यहाँ के लोगों को अपना घर छोड़कर जाना होगा।

माजुली से अब तक की मुलाक़ात बहुत बेहतरीन रही। सुबह मदमस्त कर देने वाला सनराइज़ देखा तो बाद में मिसिंग लोगों से मिले। उनके जीने के अद्भुत अंदाज़ और रहन-सहन को जानने का भी मौक़ा मिला। पर किसी जगह का कल्चर, किन्हीं एक तरह के लोगों या एक सोच से तो नहीं बनता। कल्चर तो अलग-अलग सोच रखने वाले अलग लोगों का साथ मिलकर रहना होता है।

मिसिंग लोगों की तरह माजुली में देउरी जनजाति के लोग भी काफ़ी हैं। इन्हें पुरोहित जाति कहा जाता है। इनका लाइफ़स्टाइल मिसिंग लोगों से मिलता-जुलता है पर इनकी अपनी अलग बोली और अलग त्योहार हैं। मिसिंग लोग ‘आली-आय-लिगांग और पोराग’ त्योहार मनाते हैं तो इन लोगों का मुख्य त्योहार ‘बिहु’ है। सभी त्योहार खेती-बाड़ी से जुड़े होते हैं। त्योहारों में अच्छा नाच-गाना होता है और म्यूज़िक के लिए ये अपने ख़ुद के बनाए इंस्ट्रुमेंट इस्तेमाल करते हैं।

वैसे यहाँ के जीवन की झलक पाने का सही मौक़ा तो त्योहार हैं। उनके अलावा यहाँ के ‘सत्र’ देखना ज़रूरी हैं। इनमें आपको माजुली के जीवन, उसकी संस्कृति और वहाँ के लोगों की ज़िंदादिली की छोटी-सी झाँकी ज़रूर दिख जाएगी।

‘सत्रों’ को आप यहाँ के पूर्वजों द्वारा बनाए गए छोटे म्यूज़ियम भी कह सकते हैं जहाँ ये लोग अपनी लोकल भाषा, कला, और जीने के मूल अंदाज़ को सजोकर रखते हैं। इनकी स्थापना भारत में ‘नवजागरण’ के समय हुई थी। काफ़ी सत्र वैष्णव भक्ति केंद्र भी हैं, पर तब भी हर ‘सत्र’ की अपनी अलग पहचान होती है।

काफ़ी ‘सत्र’ मूर्ति-कला, संगीत और साहित्य के केंद्र भी हैं। 1950 में आए भूकंप में बहुत-से सत्र और काफ़ी गाँव माजुली से टूटकर पानी में जा मिले थे। जिसके बाद से सत्रों की संख्या कम रह गई।

अपने ऊपर लगातार बने हुए ख़तरे को जानते हुए भी लोग यहाँ सालों से ज़िंदगी बसाए हुए हैं। प्रकृति के साथ रहकर जीने की कला को ये लोग बख़ूबी जानते हैं। प्रकृति संग ऐसी बैलेंस्ड ज़िंदगी जीते हैं जो किसी कला से कम नहीं। और घूमते रहें तो ट्रैवलिंग आपको ज़िंदगी के ऐसे अनोखे रंग-रूप दिखाती है और आपको अमीर बनाती है।

लोगों से मिलते-मिलते शाम के क़रीब 3 बज चुके थे। अँधेरा होने से पहले आज हमको अपने टेंट्स जमाने की जगह देखनी थी। घूमते-फिरते हम नदी के उसी छोर पर पहुँच गए जहाँ से सुबह का सनराइज़ देखा था। वहीं ब्रह्मपुत्र के किनारे पर टेंट जमाकर, ढलते सूरज को अलविदा कह, माजुली में दूसरा दिन पूरा किया।

चौथा दिन। माजुली से कोहिमा।

माजुली में दो रात बिताकर अब टाइम था आगे निकलने का।

पिछली रात को जहाँ टेंट लगाया था वहाँ से घाट बस कुछ ही दूर था। प्लान ये था कि सुबह सबसे पहली फ़ेरी लेकर वापस निकल लेंगे जोरहाट के लिए और फिर वहाँ से सीधा कोहिमा। सुबह आँख खुली तो सीधा ही क्षितिज दिखा और दिखी दिन की सबसे पहली लालिमा आसमान की। चौथे दिन की मनमोहक शुरुआत के बाद अब टाइम था ट्रैवल करने का, पूरे दिन।

माजुली से वापस निकलने का क़तई भी मन नहीं था, पर क्या करें, आगे नागालैंड नज़र आ रहा था। यहाँ भी नहीं गए थे, किताबों से जाना था कि नागालैंड को ‘Land of Festivals’ भी कहा जाता है। इसलिए हमारा इरादा मेन तो हॉर्नबिल फ़ेस्टिवल देखने का था।

वापसी का रास्ता बिलकुल वैसे ही है जैसे आए थे – फिर फ़ेरी से। घाट से पहले जोरहाट और फिर आगे रोड के रास्ते – दीमापुर होते हुए नागालैंड की राजधानी कोहिमा। माजुली से कोहिमा क़रीब 243 किलोमीटर है। पूरा दिन हमारा कार में बैठे-बैठे गया। पूरा दिन असम को निहारते हुए सोच रहे थे कि कितना असीम और अनोखा है असम। सुनहरे सनराइज़-सनसेट के अलावा इसकी भूगोलिक स्थिति इतनी ज़बर है कि यहाँ आपको बीच, समंदर, प्लेन और पहाड़ सब मिल जाएँगे। इसका बड़ा भाग ब्रह्मपुत्र वैली में फैला है, इसके अलावा बराक वैली का कुछ हिस्सा और मेघालय, नागालैंड से सटे पहाड़ी इलाक़े भी इसमें आते हैं। अभी काफ़ी असम बाक़ी है, कुछ पोस्ट्स बाद फिर वापस आएँगे! 😎

इधर अँधेरा होने से पहले हम कोहिमा पहुँच गए थे। पूरे रास्ते फ़्रेश अनानास खाने को मिले। पहुँचकर टेंट लगाने का कोई सीन नहीं था तो रात बिताने का जुगाड़ होटल में किया। मशक़्क़त करनी पड़ी, पर समझ गए कि हॉर्नबिल फ़ेस्टिवल के टाइम नागालैंड जाएँ तो सबसे पहले रुकने की जगह पक्की कर लें। टूरिस्ट ज़्यादा होते हैं तो उस समय सब फ़ुल होता है, रुकने की दिक़्क़त आ सकती है। बाक़ी सब मस्त था।

पाँचवाँ दिन। कोहिमा शहर से घूमने की शुरुआत।

नॉर्थईस्ट यात्रा का पाँचवाँ दिन, और हम थे नागालैंड की राजधानी कोहिमा में। ब्रह्मपुत्र वैली की समतल-पहाड़ी ज़मीन से नज़ारा बदलकर अब पूरा पहाड़ी हो गया था। पिछले दिन माजुली से कोहिमा पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई तो जगह को देखने का ख़ास समय नहीं मिला। पर रात में रहने के लिए जगह ढूँढते-ढूँढते जगह की एक छोटी-सी झलक ज़रूर देखने को मिल गई। सबकुछ बड़ा कूल-सा लग रहा था।

एक तो हम वहाँ दिसंबर में गए थे जो कि नॉर्थईस्ट घूमने का बेस्ट मौसम है, ऊपर से फ़ेस्टिवल वाला महीना भी – हॉर्नबिल फ़ेस्टिवल और फिर क्रिसमस। रात की रोशनी में पूरा शहर जगमग था। रोड किनारे स्ट्रीट फ़ूड के ढेर सारे ठेले लगे थे जहाँ से उठती लज़ीज़ ख़ुशबू ललचा रही थी। साथ इसके लोकल क्राउड का भी अपना अलग स्वैग था। रात के हिसाब से भी घूमने के नज़रिए से काफ़ी कम्फ़र्टिंग माहौल था, तो यहाँ के क़ायल होते हुए समय नहीं लगा।

सुबह आँख खुलते ही सबसे पहले तो हम टेरेस की ओर भागे, यहाँ का सूर्योदय मिस नहीं करना था। रात को जगह का केवल अहसास ही हो पाया था, नज़रों से नज़ारा दिन के उजाले में कहाँ देखा था! क्या सही सुबह थी, आप ख़ुद फ़ोटो में देख लीजिए। सुबह की रोशनी में नहाते हुए तो कोहिमा एकदम कोहिनूर दिखता है!

नौ बजे तक हम खा-पीकर निकल लिए हॉर्नबिल फ़ेस्टिवल देखने के लिए जो कि कोहिमा से क़रीब 10-12 किलोमीटर दूर हॉर्नबिल हेरिटेज कॉम्प्लेक्स में होता है। हमारा पहला मक़सद आख़िरकार हॉर्नबिल फ़ेस्टिवल देखना ही था क्यूँकि हमारे हिसाब से किसी भी जगह और वहाँ के लोगों के स्वभाव को जानने का सबसे सही तरीक़ा वहाँ के त्योहारों में शामिल होना है।

वैसे भी नागालैंड अपने त्योहारों के लिए फ़ेमस है तो कैसे छोड़ते। पर यहाँ के लोगों के आदर-भाव और वेल्कमिंग नेचर की भी जितनी कहें वो कम होगा। यह बात कोहिमा जाकर साफ़ पता लगती है। बाक़ी आप वहाँ जाकर जब आइंस्टाइन, कलाम, एमीनेम और चे से रोड पर मिलेंगे तो यहाँ की विचारधारा से भी मुख़ातिब होंगे। 😁

कोहिमा और आसपास का इलाक़ा मुख्यतः आंगामी नागा जनजाति की धरती है, हालाँकि हॉर्नबिल फ़ेस्टिवल में नागालैंड की क़रीब सोलह से ज़्यादा प्रमुख जनजातियाँ – अओ, कोन्याक, सूमी, चांग, ज़ेलियांग और बाक़ी सब – एक साथ इकट्ठा होती हैं, हर एक की अपनी अलग बोली, पहनावा और परंपरा। इतनी भाषाई विविधता को जोड़े रखने का काम करती है नागामीज़ – एक तरह की सरलीकृत असमिया-आधारित बोली, जो पूरे राज्य में लोगों को आपस में जोड़ने का ज़रिया बनती है। ईसाई धर्म यहाँ की पहचान का बड़ा हिस्सा है, पर पुराने आदिवासी रीति-रिवाज़ और मॉर्ंग (यूथ डॉर्मिटरी) जैसी परंपराएँ आज भी त्योहारों में ज़िंदा दिखती हैं।

नॉर्थईस्ट की कहानी में आगे बढ़ने से पहले आप हमें ये बताइए।
“जब आप घूमने के लिए कहीं जाते हैं, तो बेशक एक मोमेंट के लिए ही सही, घर की याद आई है?”

ट्रैवल करते समय ऐसा फ़ील करने की बेहिसाब वजहें हो सकती हैं। कभी कहीं आपकी जर्नी इतनी लंबी हो जाएगी कि बस से उतरकर रास्ते पर ही बैठ जाओ। कभी पहाड़ों में विचरते-विचरते मौसम की ऐसी मार लग सकती है कि नानी का घर तक याद आ जाए। एक फ़ैक्टर ये भी सटीक बैठता है कि ट्रैवल आपको आपके कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर धकेलती है। आप किस तरफ़ आगे बढ़ते हो, वो आप पर है। इसी डिस्कंफ़र्ट के मोमेंट में आप अपना ‘पैलेस ऑफ़ ज़ेन एंड पीस’ खोजते हो। हमारी मानें तो ये भी ट्रैवल की एक फ़ुल्फ़िलिंग-सी फ़ीलिंग होती है और ऐसी ट्रिप्स पर ये वारदात होते-होते हो ही जाती है।

पर नॉर्थईस्ट इंडिया से पहली मुलाक़ात की इस ट्रिप पर हम पिछले पाँच दिनों में इतना घूम लिए थे कि थकान अब दिमाग़ के अंदर वाले कोने की सेल में घुस चुकी थी। पिछले पाँच दिनों में हमने भारत का वो हिस्सा जिसे किताबों में ‘सेवन सिस्टर स्टेट्स ऑफ़ इंडिया’ कहते हैं, इतने क़रीब से देखा और जिया कि दिमाग़ सब कुछ प्रॉसेस करने के लिए ब्रेक की माँग करने लगा था।

कुछ यूँ हुआ कि हॉर्नबिल फ़ेस्टिवल में कॉन्सर्ट देखते-देखते कब रात के ग्यारह बज गए, हमें पता ही नहीं चला। हॉर्नबिल में माहौल होता ही इतना मदमस्त है। अपने रुकने का प्रबंध तो एंट्री गेट के सामने वाली टपरी के पीछे था – विद क्रेज़ी वैली व्यू। म्यूज़िक कॉन्सर्ट ख़त्म होते-होते हम लोग बाहर आ गए।

Hornbill Festival के रंगों ने तो मानो घर कर लिया है हमारे दिलों-दिमाग़ में। रह-रहकर इस त्योहार के रंग, इसकी विविधता और फ़ेस्टिवल में जो लोग मिले – सब यादों की फ़्लैशबैक बन गए। चलिए, आपको हॉर्नबिल फ़ेस्टिवल से जुड़े कुछ फ़न फ़ैक्ट्स बताते हैं –

हॉर्नबिल 1 से 10 दिसंबर तक हर साल होता है। पर ये शुरू हुआ सन 2000 से – दिसंबर 1 को नागालैंड दिवस मनाया जाता है, बस फ़ेस्टिवल को भी उसी के साथ शुरू करने का निर्णय लिया गया।

हॉर्नबिल फ़ेस्टिवल नागालैंड की राजधानी कोहिमा से 12 किलोमीटर दूर किसामा नागा हेरिटेज विलेज में आयोजित किया जाता है।

किसामा गाँव में फ़ेस्टिवल का वेन्यू माउंट जाप्फ़ू के फ़ुट-हिल्स में नागालैंड टूरिज़्म का एम्फ़ी-थिएटर होता है।

फ़ेस्टिवल में साइकिलिंग, बाइकिंग, फ़ोटोग्राफ़ी कम्पटीशन के अलावा लगभग हरेक नागा जनजाति का सांस्कृतिक प्रदर्शन होता है।

फ़ेस्टिवल की गैलरी में बाँस और नागा संस्कृति से जुड़ी तमाम चीज़ें बिकती हैं। मसलन आप क्रॉस-बो से लेकर खुखरी, जापानी तलवारें, बाँस की कटलरी, फ़र्नीचर, कपड़े और भी बहुत कुछ ख़रीद सकते हैं।

फ़ेस्टिवल में इंडिया पोस्ट का एक काउंटर हर साल लगता है – 10 रुपये में एक पोस्टकार्ड मिलता है, आप यहीं से चिट्ठी भेज भी सकते हैं।

टपरी वाले भाई को खाने के लिए पहले ही बोल गए थे। जाते ही अपने को खाना रेडी मिला। खाना-पीना पेलकर हम सोने की तैयारी करके, सुस्ताते बातें कर रहे थे कि हम में से एक भाई बोल पड़ा – “ओए घर चलें क्या?” नॉर्थईस्ट की विल्डरनेस से ओत-प्रोत, हम पिछले पाँच दिन से गाड़ी में ही पड़े थे। घर का नाम सुनते ही सबकी नींद सरकार की उस फ़ाइल की तरह ग़ायब हुई जिस पर सरकार के दुश्मन मीडिया चैनल्स की भी नज़र नहीं पड़ती। सब एकदम से होश में आ गए। अब सारा दारोमदार हमारे दोनों ड्राइवर्स पर था। ये दोनों ही बेगूसराय से गुवाहाटी उस गाड़ी को लेकर आए थे जो अगले 10 दिनों तक हमारा चलता-फ़िरता घर बन गई। नींद और रेस्ट की सबसे ज़्यादा ज़रूरत इन दोनों की ही थी। पर घर जाने की बात सुनकर दोनों को मानो वही ग़ायब सरकारी फ़ाइल मिल गई। दोनों दुश्मन मीडिया चैनल के सूत्र बनने को तैयार होते दिखे। फ़टाक से सारी रात गाड़ी चलाने के लिए दोनों तैयार – सीन बन गया। सोने के लिए लगाए हुए टेंट हमने लपेटकर गाड़ी में रखे और रात को ही हॉर्नबिल से फिर असम के लिए निकल लिए।

असम में क्या? अरे असम में हम में से एक भाई का घर है, करीमगंज में। मेघालय के नीचे वाले असम के एक हिस्से में, बांग्लादेश बॉर्डर से सटा हुआ एक छोटा-सा टाउन है – करीमगंज। असम की नैचुरल और कल्चरल ब्यूटी का एक हिस्सा इसके खाते में भी आता है। पर अपने को तो इन सब चीज़ों से बढ़कर घर जाने की ज़्यादा ख़ुशी हो रही थी। घर का कॉम्फ़र्ट तो आपको वहीं मिल सकता है ना जहाँ माँ होती है। यही सब सोचकर हम सबका मन तुरंत घर जाने का बन गया था। घर पहुँचने में और तो कोई मशक़्क़त नहीं हुई, बस यही था कि रास्ता बहुत लंबा था।

छठा दिन। कोहिमा शहर से करीमगंज।

गूगल मैप के अनुसार नागालैंड से घर पहुँचने में हमको क़रीब दस घंटे लगने थे। सो हम अपनी पेटियाँ कसकर सफ़र पर निकले थे। उस रात का तो हमको पता नहीं, पर हमारी अगली सुबह अलौकिक हुई। सूर्य देवता ने जंगल पर पसरे बादलों पर ऐसी रोशनी बिछाई कि बस पूछो मत!

रात बारह बजे से, अब अगले दिन दोपहर के बारह बज चुके थे। हम लुमडिंग से सिलचर वाले रास्ते पर चले ही जा रहे थे। गूगल जितने टाइम में घर पहुँचने की कह रहा था, उतने में तो हम अभी तक सिलचर भी नहीं पहुँच पाए थे। घर पहुँचने की आस में, सुबह का नाश्ता दोपहर में खाया गया।

गाड़ी में पड़े-पड़े पाँचवें से छठा दिन बीतने लगा था। हमारी सुपरस्टार Ecco ने भी हमें अब तक किसी भी मामले में निराश नहीं किया था। ड्राइवर कम्पार्टमेंट वाली दो सीटों पर तो दोनों सारथियों ने क़ब्ज़ा जमाया हुआ था। उसके पीछे वाली सीट पर तीन जने मस्त पैर फैलाए खिड़की से नज़ारों का स्वाद लेते सफ़र कर रहे थे। जो सबसे मज़ेदार सीट थी वो थी पीछे डिक्की में बना एक पर्सनल सुइट। सीटों के नीचे और बीच में सारे रकसैक्स, टेंट्स और खाने का सामान जमाया गया, और उसके ऊपर दो-तीन दरियों की लेयर्स से मस्त बेड बनाकर, तीन सौ साठ डिग्री नज़ारों वाला पूरा बेडरूम तैयार किया गया था। हदें हम सभी पार करते हुए आए थे, और इन हदों को पार करने में हमारी सुपरस्टार Ecco का साथ सबसे अहम था। माजुली पहुँचने के लिए हमने अपनी सुपरस्टार Ecco को भी ब्रह्मपुत्र नदी पार कराई थी। चलाकर नहीं, फ़ेरी से। पूरी ट्रिप पर यही हमारा चलता-फ़िरता घर थी।

हम फिर से गाड़ी में बैठकर चले ही थे कि पीछे सुइट में बैठे बंदे की अंगड़ाई ने एक ख़तरनाक कमाल दिखाया। गाड़ी में अचानक से पीछे की कंपार्टमेंट से धूल का धुआँ घुस आया। पता चला खिड़की खुल गई! खुल नहीं गई, निकलकर गिर गई। हम सबकी जान हलक में – खिड़की का शीशा गया, रास्ते भर धूल-मिट्टी से बचेंगे कैसे और शीशा मिलेगा कहाँ? हुआ ये कि पीछे लेफ़्ट साइड वाली खिड़की का शीशा सोते बंदे के पैर के प्रेशर से निकलकर गिर गया।

तो अब गाड़ी में हम अपने साथ जंगल, जंगल की आवाज़ें और रास्ते की धूल साथ लेकर चल रहे थे। अपने फेफड़ों में ढाई-ढाई किलो धूल भरकर हम सूरज ढलने से पहले सिलचर पहुँच पाए थे। सिलचर से हम मेन हाईवे पर चढ़ गए और बराक नदी के सहारे-सहारे घर की ओर, बस चलते ही रहे। जंगल से निकलने के बाद कुछ दूर चलकर हमें लोग-बाग नज़र आए। रास्ते में एक दुकान पर गाड़ी का शीशा सेट करवा के, रात आठ-साढ़े आठ तक हम घर पहुँच गए।

अब जिस रास्ते हम चल रहे थे उसकी कहानी बताते हैं। हमें अपनी नॉर्थईस्ट ट्रिप पर बारी-बारी सभी राज्यों से दो-दो-चार दिन रुकते हुए चलना था। नागालैंड में हॉर्नबिल फ़ेस्टिवल अटेंड करके मणिपुर की राजधानी इंफाल जाने का भी सीन था। मणिपुर देखकर हम वहाँ से सिलचर आते और फिर वहाँ से अपने घर। पर हॉर्नबिल से सीधा घर आने के सीन की वजह से, हमने मणिपुर और आगे त्रिपुरा जाने की संभावनाएँ रद्द कीं और अपनी गाड़ी वापस दीमापुर की तरफ़ घुमाकर, एक अलग रास्ते से सीधा सिलचर आने का निर्णय लिया। जिस रास्ते से हम सिलचर आ रहे थे, वो बराक घाटी के घने जंगल से होकर गुज़रता है। बारिश के मौसम में इस रास्ते से निकलना नामुमकिन होता है। चूँकि हम दिसंबर में गए थे, तो रास्ता सूखा मिला। पर रास्ते की हालत एकदम ख़त्म थी। गाड़ी के साथ हमारे अंजर-पंजर भी आवाज़ कर रहे थे। ऊपर से रास्ते भर जितने भी गाँव-क़स्बे पड़े, ज़्यादातर जंगल की गहराइयों में ग़ायब थे। सड़क से तो आपको दूर-दूर तक पहाड़ियों पर फैले घने जंगल के सिवाय कुछ नहीं दिखेगा।

घर पहुँचकर एक बड़ी राहत-सी महसूस हुई। पिछली रात से अगली रात हो चुकी थी। लगभग-लगभग चौबीस घंटे के इस सफ़र ने हमारा माथा सन्न कर दिया था। रास्ते भर नज़ारे कम नहीं दिखे, इतने कि देखते-देखते हमारी आँखें थक गईं। गाड़ी चलाने वाले बंदों की तो पूछो ही मत, उनकी आँखें तो अलग चुँधियाई हुई थीं। उनको काम कम पर उनकी आँखों को रेस्ट की ज़्यादा ज़रूरत थी। सभी थककर चूर थे।

इधर घर पर दोपहर से ही खाने की तैयारियाँ हो रही थीं। इतने तरीक़े की फ़िश बनी थी कि पहले तो समझ ही नहीं आया कि क्या-क्या खाएँ। थकान-थकान में हमने खूब खाया और खाते ही जो नींद आई कि पता भी नहीं लगा। अगले एक-दो दिन तो हम यहीं रहने वाले थे, इसके पूरे-पूरे असर बनते दिख रहे थे। अगले भाग में घरवालों से और उनके करीमगंज से मिलाते हैं।

सातवाँ दिन। करीमगंज की कहानी।

सुबह उठे तो जैसे नई देह-आत्मा लेकर उठे। सबकुछ एकदम फ़्रेश लग रहा था। एक लंबी, ख़त्म न होने वाली जर्नी के बाद घर पर एक गहरी नींद से बेहतर कुछ नहीं। दिसंबर की चटक धूप, आसपास की हरियाली में बसा कोहरा और पत्तों से छनकर आती रोशनी, परछाई – हम सब महसूस कर पा रहे थे। घर पर ब्रेकफ़ास्ट रेडी जल्दी हो गया, अंकल को अपने ऑफ़िस पर जाना होता है। खाने में एकदम फ़्रेश फ़िश और उसमें असम के मसालों की ख़ुशबू। क्या ही कहें, वो क्या है ना कि स्वाद, ख़ुशबू, सुनहरे पल और यादें बताकर भी नहीं बताई जा सकतीं। इनको तो केवल ख़ुद से जीकर ही महसूस किया जा सकता है।

करीमगंज को जानना हो तो शुरुआत उसकी भूगोलिक और सांस्कृतिक पोज़िशन से करनी पड़ेगी। ये टाउन असम की बराक वैली में आता है – वो हिस्सा जो ब्रह्मपुत्र वैली से बिलकुल अलग मिज़ाज रखता है। कुशियारा नदी, जो बराक नदी की ही एक शाखा है, यहीं से बहती है और बांग्लादेश की तरफ़ निकल जाती है। पुराने ज़माने में करीमगंज सिलहट ज़िले का हिस्सा हुआ करता था, बँटवारे के बाद यह असम में आ गया और सिलहट बांग्लादेश में चला गया – तो यहाँ की बोली, खाना और कल्चर में आपको बंगाली और असमिया दोनों रंग साफ़ नज़र आते हैं। यहाँ ज़्यादातर लोग बंगाली बोलते हैं, पर असमिया माहौल में पले-बढ़े। सरहद पर बसा होना इस जगह को एक अलग ही टेक्सचर देता है – हल्की-सी उदासी, हल्की-सी ज़िंदादिली, दोनों साथ-साथ।

घर पर रुकने के अगले दो दिन बस आराम के नाम रहे। कोई इटिनरेरी नहीं, कोई अलार्म नहीं। सुबह देर तक सोना, दोपहर में छत पर बैठकर धूप सेंकना और घरवालों के साथ पुरानी बातें करना – यही सारा शेड्यूल था। घर के पीछे एक छोटा-सा पर्सनल पौंड (तालाब) भी था, जहाँ अंकल ख़ुद मछली पालते थे। शाम होते-होते एक-दो घंटे हम वहीं बैठकर मछली पकड़ने में निकाल देते। कोई जल्दी नहीं थी, ना पकड़ने की, ना छोड़ने की। बस पानी में डोर डाले बैठे रहना, बीच-बीच में बतियाना, और शाम ढलते देखना।

छोटे-छोटे टाउन की यही तो ख़ूबी होती है – यहाँ कुछ “देखने” को नहीं मिलता, पर बहुत कुछ “जीने” को मिल जाता है। भारत के किसी भी कोने में चले जाओ, हर छोटे क़स्बे की अपनी एक चाल होती है, अपना एक सुकून होता है, जो बड़े शहरों की भागदौड़ में कहीं खो जाता है। करीमगंज ने हमें ठीक यही याद दिलाया – कि ट्रिप में हर दिन नई जगह भागना ज़रूरी नहीं, कभी-कभी रुक जाना भी सफ़र का हिस्सा होता है।

दो दिन के इस ठहराव ने बदन और दिमाग़ दोनों को रिचार्ज कर दिया था। अब आगे का रास्ता बुला रहा था – मेघालय की तरफ़।

नौवाँ दिन। करीमगंज से डावकी, मेघालय।

दो दिन के आराम के बाद सुबह-सुबह फिर बैग पैक हुए, गाड़ी में सामान लदा और निकल पड़े मेघालय की तरफ़। करीमगंज से मेघालय का रास्ता जितना छोटा लगता है नक़्शे पर, उतना ही दिलचस्प निकला असल में। असम के मैदानी इलाक़ों से निकलकर जैसे ही आप जयंतिया हिल्स की तरफ़ बढ़ते हैं, ज़मीन का रंग-ढंग एकदम बदल जाता है – खेतों की जगह घने जंगल और छोटी-छोटी पहाड़ियाँ लेने लगती हैं।

रास्ते में जो सबसे पहले चौंकाया वो थीं नदियाँ। नीले आसमान जैसा साफ़ पानी, इतना पारदर्शी कि नीचे पड़े पत्थर तक साफ़ गिने जा सकें। पहली बार लगा कि नदी का पानी सच में “नीला” भी हो सकता है, सिर्फ़ किताबों में पढ़ी बात नहीं है ये।

रास्ते में नरपुह वाइल्डलाइफ़ सेंचुरी पड़ती है, जो जयंतिया हिल्स के घने जंगलों का हिस्सा है। ये इलाक़ा अपने लाइमस्टोन (चूना-पत्थर) की गुफाओं और बेहद समृद्ध जैव-विविधता के लिए जाना जाता है – यहाँ की गुफ़ाएँ नॉर्थईस्ट की सबसे लंबी गुफ़ा प्रणालियों में गिनी जाती हैं। जंगल इतना घना है कि सड़क पर चलते हुए भी हरियाली आपको चारों तरफ़ से घेर लेती है।

जयंतिया हिल्स का नाम यहाँ बसे प्नार (जयंतिया) समुदाय से पड़ा है, जो ख़ासी लोगों से मिलती-जुलती लेकिन अपनी अलग पहचान रखने वाली जनजाति है। यहाँ की सोसाइटी मातृसत्तात्मक (matrilineal) है – घर की सबसे छोटी बेटी को पुश्तैनी संपत्ति और घर मिलता है, बच्चे माँ का सरनेम लेते हैं। ये चीज़ बाक़ी भारत से बिलकुल उलट है और यहाँ रहने वाले लोगों से बात करके इसकी झलक साफ़ महसूस होती है – औरतें यहाँ बाज़ार चलाती दिखती हैं, फ़ैसले लेती दिखती हैं। मेघालय के लोगों का स्वभाव बेहद सीधा और मेहमाननवाज़ है, बात करने में हिचक कम और मुस्कुराहट ज़्यादा।

शाम ढलने से पहले-पहले हम डावकी पहुँच गए – मेघालय का वो छोटा-सा बॉर्डर टाउन जो बांग्लादेश से बिलकुल सटा हुआ है, और जहाँ की उमंगोत नदी अपने साफ़ पानी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। दूर से ही नदी की चमक दिखनी शुरू हो गई थी – मानो पानी नहीं, शीशा बिछा हो।

दसवाँ दिन। कैंपिंग बाय डावकी रिवर।

डावकी पहुँचकर सबसे पहला काम था नदी के किनारे नज़र दौड़ाना, और यक़ीन मानिए, नज़ारा किसी सपने से कम नहीं था। उमंगोत नदी को यूँ ही “द क्लीनेस्ट रिवर इन इंडिया” नहीं कहा जाता। पानी इतना साफ़ और शांत है कि नाव पानी में तैरने के बजाय हवा में उड़ती हुई-सी लगती है – नीचे मछलियाँ, पत्थर, हर चीज़ ऐसे दिखती है जैसे शीशे के फ़र्श के ऊपर बैठे हों। फ़ोटो में जो नाव “हवा में तैरती” दिखती है, वो कोई एडिटिंग ट्रिक नहीं, असली बात है।

नदी किनारे टेंट लगाया, बोरियाँ खोलीं और शाम होने से पहले ही डेरा जमा लिया। यहाँ ज़िंदगी बड़ी सीधी-सादी है – सुबह उठो, नदी में उतरो, दिन भर बोटिंग करो, कभी लोकल फ़िशरमेन के साथ बैठकर मछली पकड़ने का तरीक़ा सीखो, और शाम होते ही किनारे बैठकर सूरज को डूबते देखो।

एक शाम हम नदी के उस पार, ज़ीरो-लाइन तक भी गए जहाँ से बांग्लादेश की सरहद बस चंद क़दम दूर दिखती है। दोनों तरफ़ की ज़िंदगी एक ही नदी के दो किनारों पर बँटी हुई-सी लगती है – एक ही पानी, दो अलग मुल्क। सरहद पर खड़े होकर ये सोचना कि इंसानों ने ज़मीन पर लकीरें खींच दीं, पर नदी को कोई पासपोर्ट नहीं चाहिए बहने के लिए – एक अजीब-सा एहसास था।

रात को कैंपफ़ायर जलाकर बैठे, दिन भर की थकान नदी की आवाज़ में घुल गई। बांग्लादेश बॉर्डर की रोशनियाँ दूर टिमटिमाती दिख रही थीं, और इस तरफ़ हम, अपनी छोटी-सी दुनिया में, बिलकुल मुतमइन। नॉर्थईस्ट की इस ट्रिप में डावकी की ये रात शायद सबसे शांत रातों में से एक थी।

अगली मंज़िल थी सोहरा – जिसे बाक़ी दुनिया चेरापूंजी के नाम से जानती है।

ग्यारहवाँ दिन। डावकी टू सोहरा (चेरापूंजी)।

डावकी से सोहरा का रास्ता ज़्यादा लंबा नहीं है, पर हर मोड़ पर नज़ारा बदलता रहता है। शुरुआत में सड़क जयंतिया और ख़ासी हिल्स के बीच से गुज़रती है, कहीं घने जंगल तो कहीं अचानक खुलकर सामने आती गहरी घाटियाँ। जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती है, हवा में नमी और ठंडक दोनों साफ़ महसूस होने लगती है – याद आता है कि यही तो वो इलाक़ा है जो दुनिया की सबसे ज़्यादा बारिश वाली जगहों में गिना जाता है।

सोहरा पहुँचते-पहुँचते शाम होने को थी, और अब चुनौती थी कैंपिंग के लिए सही जगह ढूँढने की। यहाँ की पहाड़ियाँ इस तरह से कटी हुई हैं कि एक तरफ़ आपको गहरी घाटी और नीचे बांग्लादेश के मैदान धुँधले-से दिखते हैं, तो दूसरी तरफ़ बादल पहाड़ों से टकराकर बिखरते हैं। काफ़ी घूमने के बाद आख़िरकार एक रिज (ridge) पर जगह मिली, जहाँ से नज़ारा तीन सौ साठ डिग्री का था।

टेंट जमाया, सामान उतारा, और जैसे ही सूरज ढलना शुरू हुआ, बादलों ने पूरी घाटी को अपने आग़ोश में ले लिया। रात होते-होते नीचे बादलों का समंदर बिछ गया था और हम मानो उसके ऊपर तैर रहे थे। ठंड ज़बरदस्त थी, पर वो नज़ारा उस ठंड को झेलने लायक़ से कहीं ज़्यादा था। रिज पर बैठकर, चाय के कप के साथ, हमने सोहरा की अपनी पहली रात यूँ ही गुज़ार दी – बिना किसी जल्दी के, बस नज़ारों में डूबे हुए।

बारहवां दिन। एक्सप्लोरिंग सोहरा एंड नियरबाय विलेजेस।

अगली सुबह से शुरू हुई सोहरा की असली एक्सप्लोरिंग। सोहरा यानी चेरापूंजी – एक ज़माने में दुनिया की सबसे ज़्यादा बारिश वाली जगह का ख़िताब इसी के नाम था, और आज भी मॉनसून में यहाँ की बारिश देखकर यक़ीन आ जाता है कि ये टैग यूँ ही नहीं मिला था। पहला पड़ाव रखा सेवन सिस्टर्स फ़ॉल्स का, जिसे लोकल भाषा में नोहस्नगिथियांग फ़ॉल्स भी कहा जाता है – सात अलग-अलग धाराओं में गिरता पानी, बरसात में तो नज़ारा और भी क़यामत का हो जाता होगा, सर्दियों में भी कम मदहोश करने वाला नहीं था।

इसके बाद रुख़ किया मेघालय के “बैकवाटर्स” की तरफ़ – छोटी-छोटी नदियाँ और तालाब जो घने जंगलों के बीच से गुज़रते हुए एक अलग ही सुकून देते हैं, भीड़-भाड़ वाले टूरिस्ट स्पॉट्स से बिलकुल अलग।

उसके बाद निकले नोहकलिकाई फ़ॉल्स के पिछवाड़े की तरफ़ ट्रेक करने। नोहकलिकाई भारत का सबसे ऊँचा प्लंज वॉटरफ़ॉल है, और इसके पीछे एक दुखद लोककथा भी जुड़ी है – का लिकाई नाम की एक स्त्री की कहानी, जिसके नाम पर ही इस झरने का नाम पड़ा। झरने के ऊपर से देखने के बजाय पीछे की तरफ़ से ट्रेक करके जो एंगल मिला, वो बिलकुल अलग और कम देखा हुआ अनुभव था।

पर इस दिन का सबसे यादगार हिस्सा रहा एक छोटी-सी हाइक – लिविंग रूट ब्रिज देखने के लिए। ये पुल कोई इंजीनियर नहीं बनाते, बल्कि ख़ासी और जयंतिया जनजातियाँ रबड़ के पेड़ (फ़ाइकस इलास्टिका) की जड़ों को सालों-साल तक धीरे-धीरे बुनकर तैयार करती हैं, जब तक कि वो जड़ें इतनी मज़बूत ना हो जाएँ कि लोगों और सामान का वज़न सह सकें। एक पुल बनने में पंद्रह-बीस साल तक लग जाते हैं। घने जंगल में उतरते हुए, नदी पार करते हुए, जब पहली बार वो जड़ों से बना पुल सामने आया तो यक़ीन करना मुश्किल था कि प्रकृति और इंसान मिलकर ऐसा कुछ बना भी सकते हैं।

रास्ते में जो गाँव पड़े, वो जंगल के बीचोंबीच इस तरह बसे हैं कि दूर से पता ही नहीं चलता कि यहाँ कोई बस्ती भी होगी। घर लकड़ी और बाँस के, संकरी पगडंडियाँ, और हर घर के आसपास सुपारी और संतरे के पेड़। यहाँ के लोग सदियों से इसी तरह जंगल के साथ, जंगल के हिसाब से जीना सीख चुके हैं – ना जंगल को काटा, ना उससे लड़े, बस साथ चलना सीख लिया। यही वो सबक़ था जो सोहरा के इन गाँवों ने हमें सिखाया – कि प्रकृति के साथ एक हो जाना कोई फ़लसफ़ा नहीं, एक तरीक़ा है जीने का, और यहाँ के लोग इसे बरसों से बड़ी सादगी से जीते आ रहे हैं।

तेहरवां दिन। चेरापूंजी टू शिलांग एयरपोर्ट।

सोहरा में जो दो दिन बिताए, वो नॉर्थईस्ट की इस पूरी ट्रिप के सबसे यादगार दिनों में गिने जाएँगे। अब बारी थी इस सफ़र को समेटने की। सुबह टेंट उखाड़ा, आख़िरी बार बादलों के उस समंदर को निहारा, और निकल पड़े शिलांग की तरफ़ – जहाँ से फ़्लाइट पकड़नी थी दिल्ली के लिए।

रास्ते में एक पिट-स्टॉप लिया उमियम लेक पर – शिलांग से कुछ ही दूर बना ये आर्टिफ़िशियल लेक अपने चारों तरफ़ फैली पहाड़ियों की वजह से मेघालय के सबसे ख़ूबसूरत नज़ारों में गिना जाता है। पानी इतना शांत कि आसपास के पहाड़ उसमें साफ़ झलकते हैं। थोड़ी देर वहाँ रुककर चाय पी, फ़ोटो खींचीं, और नॉर्थईस्ट को आख़िरी बार आँखों में भर लिया।

पर जो हुआ उसके आगे, वो किसी को उम्मीद नहीं थी। ग्रुप में से जिस बंदे के पास फ़्लाइट की टिकट्स थीं, उसने टाइमिंग पढ़ी 18:00 की जगह 08:00 – और पूरा ग्रुप उसी हिसाब से चलता रहा। एयरपोर्ट पहुँचे तो पता चला कि फ़्लाइट का टाइम शाम का था, ना कि सुबह का, और असली गड़बड़ ये थी कि उतनी देर तक हमें पता ही नहीं चला – जब तक चेक-इन काउंटर पर पहुँचकर हक़ीक़त सामने नहीं आई, तब तक फ़्लाइट छूट चुकी थी। दस मिनट तक तो कोई कुछ बोल ही नहीं पाया, बस एक-दूसरे का मुँह देखते रहे। फिर हँसी आ गई – इतने दिन जंगलों, नदियों और पहाड़ों से बिना किसी दिक़्क़त के निपटे, और आख़िर में एक टाइमिंग की ग़लती ने पूरा प्लान पलट दिया।

शिलांग एयरपोर्ट पर बैठकर फ़ैसला हुआ कि अब सीधा दिल्ली जाने का चांस निकल चुका है, तो क्यूँ ना ट्रिप को थोड़ा और बढ़ाया जाए। गाड़ी वापस निकाली और शिलांग को अलविदा कहते हुए ट्रिप आगे बढ़ी – इस बार मंज़िल थी बेगूसराय, बिहार, जहाँ से हमारे ड्राइवर भाइयों का घर था और वहीं से आगे ट्रेन पकड़नी थी दिल्ली के लिए।

ट्रिप के आख़िरी दो दिन। शिलांग टू बेगूसराय और दिल्ली वापसी।

ट्रिप के आख़िरी दोपहर की मील का सीन बताते हैं।

नॉर्थईस्ट से दिल्ली लौटती फ़्लाइट-मिस कांड की वजह से हमें अपनी जर्नी हफ़्ते भर के लिए बढ़ानी पड़ी। वापसी में अब हमें बेगूसराय (बिहार) से होकर फिर दिल्ली पहुँचना था। सही-ग़लत नहीं पता हमको, पर अगर ट्रैवल करने का कोई और बहाना बन जाए तो कोई क्यूँ मना करेगा।

सीन कुछ यूँ हुआ कि गाड़ी में चलते-चलते हमें जैसे एक ज़माना हो चुका था। बारह दिन भटकने के बाद, शिलांग में रात बिताकर, शिलांग से पिछले दिन सुबह निकले थे और अब आज अगले दिन की दोपहर हो चुकी थी। सब कुछ कर-करके बोर हो चुके थे। बोरियत से छुटकारा पाने के लिए कुछ दिमाग़ दौड़ाया तो खाने का ख़याल सामने आया – पर कुछ अलग करने का मूड था।

सोचा कि एक घंटे भर का ब्रेक लिया जाए कहीं। खा-पी भी लेंगे और थोड़ा पैर सीधे करने का भी मौक़ा मिल जाएगा। गाड़ी किसी रेस्टोरेंट पर लगाकर कुछ ख़रीदकर खा सकते थे, पर मन बैरी कहाँ माने सीधे सपने। ख़ुद से खाना बनाने का ख़याल था मन में।

पर सड़क पर चलते-चलते कैसे भई..?

हमने लगाया दिमाग़ कि भई जितने पैसे में कुछ ख़रीदेंगे उतने में एक बड़ी-सी स्वादिष्ट फ़िश और कुछ सब्ज़ियाँ आ जाएँगी। बाक़ी बचा अपने हाथ से बने खाने का स्वाद – सोचा कि उसका ना तो कोई मोल है, और ना ही वैसा स्वाद बाहर खाने को मिलेगा।

बस फिर क्या था, ख़रीदारी की और लग गए ठिकाना ढूँढने में। मार्केट से कुछ दूर जब मेन सड़क पर निकले तो एक पुल आया, और पुल के नीचे से जा रही थी एक नदी – मतलब पानी, मतलब एकदम सही ठिकाना। बिना देर किए हमने फटाफट पत्थर सेट करके बनाया एक चूल्हा, कुछ लकड़ियाँ इकट्ठी कीं और लग गए काम पे।

धुआँ उठा, तेल गरम हुआ, और थोड़ी ही देर में पुल के नीचे उस अनजान नदी किनारे महक उठी ताज़ी फ़िश करी की। पास से गुज़रते दो-चार लोक-बाग रुके, हैरानी से देखा, फिर मुस्कुराकर आगे बढ़ गए – शायद उन्हें भी अंदाज़ा हो गया होगा कि ये कोई आम रास्ता चलते मुसाफ़िर नहीं, बल्कि ठहरे हुए सैलानी हैं। खाना बना, नदी किनारे बैठकर खाया, बर्तन धोए और चूल्हा बुझाकर फिर गाड़ी में सवार हो लिए। पेट भरा था और मन भी।

शाम ढलते-ढलते आख़िरकार हम बेगूसराय पहुँच गए – वही टाउन जहाँ से हमारे दोनों ड्राइवर भाइयों का घर था, और जहाँ से ये पूरी गाड़ी-यात्रा शुरू हुई थी। उनके घर पहुँचना जैसे इस पूरी ट्रिप को एक गोला-सा पूरा करने जैसा लगा – जिस जगह से Ecco और हमारा सफ़र शुरू हुआ था, वहीं वापस आकर उसे विदा करने का समय आ गया था। रात वहीं बिताई, अगली सुबह स्टेशन पहुँचे और ट्रेन पकड़ी दिल्ली के लिए। खिड़की से बिहार के मैदान पीछे छूटते देखते-देखते, बारह दिनों का पूरा नॉर्थईस्ट एक फ़िल्म की तरह आँखों के आगे चलता रहा – माजुली का सनराइज़, हॉर्नबिल का शोर, करीमगंज की शांति, डावकी का साफ़ पानी, सोहरा के बादल। ट्रेन दिल्ली की तरफ़ भागती रही, और हम अपने अंदर एक भरा-पूरा नॉर्थईस्ट लिए वापस लौट रहे थे।

नॉर्थईस्ट भारत से पहली मुलाक़ात – समापन

तो जी, यही थी हमारी नॉर्थईस्ट भारत से पहली मुलाक़ात – तेरहा दिन, तीन राज्य, यातायात के लगभग सारे माध्यम, एक टूटा हुआ शीशा, एक मिस हुई फ़्लाइट, और ना जाने कितनी ऐसी सुबहें और शामें जो अब हमेशा के लिए याद बन गई हैं।

पर इस ट्रिप ने हमें जो सबसे बड़ी बात सिखाई वो ये है कि भारत को असल में जानना है तो सिर्फ़ उसके “मशहूर” हिस्सों तक सीमित रहना काफ़ी नहीं। नॉर्थईस्ट इंडिया – असम, नागालैंड, मेघालय, और इनके साथ लगती बाक़ी सेवन सिस्टर स्टेट्स – भारत का वो हिस्सा है जिसे बहुत कम लोग वाक़ई घूमने का मौक़ा देते हैं। और यही सबसे बड़ी नाइंसाफ़ी है, क्यूँकि यहाँ जो कुछ है – चाहे वो माजुली के मिसिंग और देउरी लोगों की सादगी हो, नागालैंड के त्योहारों का जोश हो, या मेघालय के मातृसत्तात्मक समाज और जड़ों से बने पुलों की सदियों पुरानी सूझ-बूझ – वो पूरे देश की सांस्कृतिक विरासत का उतना ही बड़ा हिस्सा है जितना बाक़ी कोई भी कोना।

हर भारतीय को अपनी ज़िंदगी में एक बार सही, नॉर्थईस्ट ज़रूर आना चाहिए – सिर्फ़ इसके नज़ारों के लिए नहीं, बल्कि इसके लोगों से मिलने के लिए, उनकी भाषाओं को सुनने के लिए, उनकी जीने की तरीक़ों को समझने के लिए। ये हिस्सा जितना ख़ूबसूरत है, उतना ही नाज़ुक भी है – चाहे वो माजुली का धीरे-धीरे कटता किनारा हो या सोहरा के जंगलों का बदलता मौसम – और इसे जानना, इसकी इकोलॉजी और इसके लोगों का सम्मान करना, हम सबकी थोड़ी-सी ज़िम्मेदारी भी बनती है।

ये तो बस पहली मुलाक़ात थी। नॉर्थईस्ट से हमारी अगली मुलाक़ात कब होगी, ये तो पता नहीं, पर इतना पक्का है – होगी ज़रूर।

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