राष्ट्र, मज़हब और पाखंड का रायता
“मज़हब जब दिल से निकल कर दिमाग़ में चढ़ जाए तो ज़हर बन जाता है।” ~ मंटो
कम समय रह गया जब यह बात पूरी तरह सच साबित नज़र आएगी और शायद जल्दी किताबों में पढ़ाई जाएगी कि भारत अब कोई कृषि प्रधान देश नहीं बल्कि एक ठग प्रधान देश है। यहां लोगों से लेकर संसद, धर्म से लेकर पाखंड और कर्म से लेकर कांड – सब झूठ की विरासत पर चल रहे हैं। कुछ झूठ ऐसे चलते हैं कि एकदम सच्चे लगते हैं, परंतु ज़्यादातर सच झूठे निकलते हैं।
ठगों की दुनियां में कोई भी बात प्रमाण से नहीं बल्कि इससे साबित होती है कि झूठ को कितने कॉन्फिडेंस से कहा गया। झूठ को मिठास में डुबो कर परोस दो तो सच कहने वालों को अभद्र, अश्लील, बेहूदा और अनसिविलाइज्ड कहा जा सकता है। झूठे का सच्चे पर यह आरोप कभी भी लग सकता है कि उसका बिहेवियर व बात करने का तौर-तरीक़ा सही नहीं। और कमाल की बात यह है कि यहां हर एक ठग दूसरे पर ठगी का आरोप लगाता है और हर दूसरा आदमी पहले, दूसरे और तीसरे को ठगना चाहता है।
जी जनाब यह वही देश है जहां सावरकर को भगतसिंह और नेताजी बोस का गुरु कह दिया जाता है, पर सलीक़े से। डार्विन की बंदर से इंसान बनने की थ्योरी को प्रॉपगैंडा और इंसान से जानवर बनते मूर्खों को ज्ञानी बता दिया जाता है, पर तरीक़े से। राजा को प्रधानमंत्री बताते हैं, न्यायधीश को लंपट। ख़बरी को अख़बार कहते हैं, और ख़बरों को व्यापार। सरकारी व्यवस्था पब्लिसिटी की भूखी है और पब्लिक रोटी की। पैसे वाले ग़रीब को ह्यूमैनिटी सिखाते हैं, जबकि ख़ुद ह्यूमैनिटी की साख पर उल्टे लटके नज़र आते हैं।
झूठ होते हुए भी सब सच मान लिया जाता है, भरोसे का तोल-मोल करके उसको पेल दिया जाता है। जब पूरा बाज़ार अंधा हो चुका हो तो रसीदें तो नक़ली कटेंगी ही।
ऐसे समाज में सच को सच और काम को मेहनत कहने वाले कम रह जाते हैं। जो झूठ में फ़र्राट हैं वो ही अव्वल आते हैं। ऐसा अंधापन छाता है कि राजा, प्रजा को फ़क़ीर नज़र आता है। फ़क़ीर झूठ बोलकर भी नज़र नहीं चुराता है। नाले को गंगा और गंगा को माँ कह दिया जाता है, और उसमें रोज़ एक सच विसर्जित किया जाता है।
ऐसे एक सच के विसर्जन की खबर शायद आप तक आई हो। नहीं आई तो चौंकने की बात नहीं क्योंकि खबर तो ये थी कि नए संसद में झूठ सफ़ेद कुर्ते में ठहाके लगा रहा था। पब्लिक का सीना ये देख फुले नहीं समा रहा था। कोई किसी को मेडल के बदले पंद्रह करोड़ वापिस करने को कहे जा रहा था।
अगर देश के लिए मेडल जीत कर लाना कोई बड़ी बात नहीं तो फ़ेक राष्ट्रवाद की पुष्टि के लिए दस रुपए का झंडा घर पर टंगा देना भी कोई तीर मारने का काम नहीं है।
ख़ैर ये बात उस पब्लिक के पल्ले कैसे पड़े जिसने राष्ट्रवाद की परिभाषा गुरुदेव टैगोर को न पढ़कर बल्कि अंधभक्ति में सीखी हो। इसमें सारा दोष केवल काणे राजा का नहीं, आया तो वो अंधी जनता से निकलकर ही है। वो जानता है कि 2014 में गढ़ी गई पटकथा को पानी देने वाली तो ख़ुद देश की जनता ही है।
ऐसा समाज किसी ‘विश्वगुरु’ देश को सूट तो नहीं करता, पर करें क्या जब “भारत भाग्य विधाता..” को अपने ही भाग्य के विधान का अनुमान नहीं तो वो विश्व का गुरु क्या घंटा कहलाएगा!
देखिए कहीं गंगा नज़र आ जाए, बाहर नहीं तो अंदर सही!


