← रोज़नामचा · JOURNAL
तीसरा पहर
चांद चकोर नहीं,
आसमान के माथे का घाव है.
बादलों में धुआं रम चुका,
दूर कहीं क्षितिज की लाली के पीछे
बिलखती-बोलियां
बुलंद आवाज़ें बन रही हैं.
चांद चकोर नहीं,
आसमान के माथे का घाव है.
बादलों में धुआं रम चुका,
दूर कहीं क्षितिज की लाली के पीछे
बिलखती-बोलियां
बुलंद आवाज़ें बन रही हैं.