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पुण्डरिक ऋषि झील: सैंज वैली की वो झील जो घास के नीचे छुपी है

पुण्डरिक ऋषि झील: सैंज वैली की वो झील जो घास के नीचे छुपी है
पुण्डरिक ऋषि झील सैंज वैली गाइड | अपर न्याहि ट्रेक, कहानी और कैसे पहुँचें

देखकर भले ही आप बोलें कि झील कहाँ है, और यहाँ पानी कहाँ है- कम सही, पर झील में पानी है। बस बड़ी-बड़ी घास होने के कारण दिखता नहीं और साल भर ढका रहता है। लगभग चार सौ मीटर लंबी इस झील की पूरी सतह घास, सरकंडों और जड़ों के एक घने, तैरते हुए कालीन से ढकी रहती है। बरसात के महीनों में इस हरे कालीन के नीचे पानी साफ़ दिखता है, बाक़ी मौसम में ये एक नरम, दलदली घास के मैदान जैसी लगती है। बीच-बीच में गिरे हुए पेड़ों के तने टेढ़े-मेढ़े पड़े रहते हैं। अगर आपके ज़हन में हिमालय की झील का मतलब नीला साफ़ पानी और एक परफ़ेक्ट फ़ोटो है, तो यहाँ आने से पहले वो उम्मीद थोड़ा बदल लीजिए। यहाँ की दिलचस्पी अलग है, और एक बार आप झील के किनारे खड़े हों तो समझ आ जाता है क्यों।

झील सैंज वैली के अपर न्याहि (अपर नेहि) गाँव में आती है, ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के इको ज़ोन के अंदर, समुद्र तल से क़रीब 2,100 मीटर की ऊँचाई पर। यहाँ के लोगों के साथ-साथ, पूरी वैली के लोगों के लिए यह एक पूजनीय जगह है। और पुण्डरिक ऋषि, लोकल लोगों के अनुसार जिन्होंने यहाँ पर कभी तप किया था, इनके देवता हैं। सालों से यहां के लोग इन्हें पूजते आए हैं। झील के पास देवदार के जंगल में एक छोटा-सा लकड़ी का मंदिर है, और उसी जंगल के एक कोने में जेहर देवता से जुड़ी एक गुफा भी है। एक लोक-कथा ये भी है कि कभी यहाँ धान के खेत हुआ करते थे, जब तक आस-पास की वैलियों के देवताओं के बीच कोई विवाद नहीं हुआ और खेती बंद हो गई। लोगों से मिलेंगे तो झील और पुण्डरिक ऋषि से जुड़ी और भी काफ़ी सारे रोचक क़िस्से आपको सुनने को मिल जाएँगे।

समूचे भारत की तरह ही ये क़िस्से पहाड़ों में भी भारतीय ओरल लिटरेचर के ज़िंदा होने का ख़ासा सुबूत हैं। और सदियों से, बातों, लोक संगीत, त्योहारों और बुज़ुर्गों की कहानियों के ज़रिए ये क़िस्से आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचते रहे हैं और ट्रडिशन के साथ अभी भी बँधे हुए हैं।

काफ़ी में से एक क़िस्सा पुण्डरिक ऋषि और बाग़ा सराहन के शाना (मूल रूप श्याणा) ऋषि से भी जुड़ा है। जो बतलाता है कि कैसे कभी इन ऋषियों ने अपनी-अपनी जगहें आपस में बदल लीं थी। शाना ऋषि जो कभी सैंज के थे, बाग़ा चले गए और पुण्डरिक ऋषि वहाँ ये यहाँ सैंज आ गए। जब बाग़ा सराहन गए थे तब सुनने को मिला था ऐसा।
बाक़ी क्या पता ये क़िस्से समय के साथ-साथ शायद ख़ुद भी बदलते आएँ हों। थोड़ा बहुत फ़रक़ तो ज़रूर आया होगा। हमको पता नहीं, आपको पता हो तो बताइए कामेंट्स में।

कैसे पहुँचें झील तक

झील तक पहुँचने के तीन रास्ते हैं, और तीनों का अपना-अपना मिज़ाज है।

देओहरी (देहरी/देओरी) से — सबसे आसान और सबसे लोकप्रिय रास्ता

सैंज टाउन से बस या टैक्सी लेकर देओहरी गाँव पहुँचें, क़रीब आधे घंटे का सफ़र। यहाँ से ट्रेल गाँव की पोस्ट ऑफ़िस और स्कूल के पास से शुरू होता है, कोई भी लोकल आपको रास्ता दिखा देगा। देवदार और स्प्रूस के घने जंगल से होकर 30 से 45 मिनट की चढ़ाई, बरसात में जगह-जगह कीचड़ मिल सकता है इसलिए अच्छी पकड़ वाले जूते ज़रूरी हैं। ट्रेलहेड से वापसी तक कुल डेढ़ से दो घंटे का समय लगता है।

शांगढ़ से, अपर न्याहि होते हुए — थोड़ा लंबा रास्ता

अगर आप शांगढ़ में ठहरे हैं तो यहाँ से अपर न्याहि गाँव तक तीन किलोमीटर का जंगल का रास्ता है, फिर गाँव से आगे दस-पंद्रह मिनट और चलकर झील आती है। कुल मिलाकर डेढ़ से दो घंटे एक तरफ़, यानी आधे से पूरे दिन का राउंड ट्रिप। रास्ता साफ़ मार्क नहीं है, इसलिए निकलने से पहले अपने होमस्टे वाले भाई-बहन से मौजूदा हालात पूछ लें।

रोपा/नेउली की तरफ़ से, GHNP सैंज गेट के पास — पूरे दिन का ट्रेक

सबसे लंबा रास्ता। रोपा की तरफ़ से देवदार और चीड़ के घने जंगल से गुज़रते हुए रास्ता ऊपर चढ़ता है, बीच में नुहाडा वॉटरफ़ॉल आता है (पंद्रह मिनट का डिटूर, देखने लायक़), फिर सराहन गाँव जहाँ जेहर देवता का मंदिर है, और आख़िर में झील। एक तरफ़ से दो से तीन घंटे लगते हैं, यानी आना-जाना मिलाकर चार से छह घंटे का दिन।

कोई एंट्री फ़ीस नहीं है, झील तक जाने के लिए किसी परमिट की ज़रूरत भी नहीं। हाँ, अगर आप इको ज़ोन से आगे GHNP के कोर ज़ोन में जाना चाहें, तो उसके लिए रोपा सैंज रेंज ऑफ़िस से अलग परमिट लेना होगा।

कब जाएँ

मार्च से जून की शुरुआत — सूखे रास्ते, हरा-भरा जंगल, ट्रेकिंग के लिए सबसे आरामदायक मौसम।

जुलाई-अगस्त (मॉनसून) — जंगल सबसे हरा और झील में पानी सबसे ज़्यादा, पर रास्ते फिसलन भरे और जोंकों का ख़तरा रहता है।

सितंबर से नवंबर की शुरुआत — सबसे बेहतरीन विंडो। साफ़ हवा, ठोस रास्ते, और अक्टूबर में पुण्डरिक ऋषि का सालाना मेला, जब हज़ारों लोग झील पर जुटते हैं।

मध्य नवंबर से फ़रवरी — झील ज़्यादातर सिर्फ़ घास का मैदान लगती है, जंगल में बर्फ़ भी मिल सकती है। ख़ास तौर पर इसी के लिए आना ज़रूरी नहीं।

ज़रूरी बातें, ध्यान रखें

ये पूजनीय जगह है, देवता की मर्यादा से बंधी हुई, और गाँव वाले इन नियमों को कोई सुझाव नहीं बल्कि नियम मानते हैं।

– झील की घास पर पैर मत रखिए, कहीं से भी अंदर घुसने की कोशिश न करें।

– मंदिर के पास जहाँ इशारा हो, वहाँ जूते उतार दीजिए।

– शराब और मांसाहारी खाना यहाँ आस-पास पूरी तरह वर्जित है।

– धूम्रपान और किसी भी तरह का कूड़ा (फल के छिलके, टिश्यू सब कुछ) साथ वापस लेकर जाएँ।

– नियम तोड़ने पर पाँच हज़ार रुपये तक का जुर्माना लगने की बात कही जाती है, पर असली वजह जुर्माना नहीं, बल्कि यह है कि गाँव वालों ने पीढ़ियों से इस जगह की मर्यादा बनाए रखी है।

रास्ते में मोबाइल नेटवर्क लगभग नहीं के बराबर है, देओहरी और अपर न्याहि में भी कमज़ोर सिग्नल मिलता है, तो सैंज टाउन से निकलने से पहले ऑफ़लाइन मैप डाउनलोड कर लें। रास्ते में खाने-पीने की कोई दुकान नहीं मिलेगी, अपने होमस्टे से पानी और कुछ नाश्ता साथ ले जाएँ।

कहाँ ठहरें

देओहरी में कुछ छोटे, फ़ैमिली-रन होमस्टे हैं, ट्रेलहेड से दस मिनट के फ़ासले पर। सीधी-सादी, गर्म कमरे, आते ही चाय, भारी रजाइयाँ, और घर के बने हिमाचली खाने के साथ। एक रात यहाँ रुककर सुबह-सुबह झील तक की सैर — इस ट्रिप का सबसे अच्छा वर्ज़न है, बजाय इसके कि आप कहीं दूर से डे-ट्रिप बनाकर आएँ और भागते हुए वापस जाएँ। अपर न्याहि और पास के झिली न्याहि में भी होमस्टे मिल जाते हैं, अगर झील के आगे गाँव में रुकना चाहें।

झील से आगे पंद्रह-बीस मिनट चलकर अपर न्याहि गाँव आता है — सैंज वैली के सबसे ख़ूबसूरत छोटे गाँवों में से एक, अपना छोटा मैदान और साफ़ दिन में ग्लेशियर की तरफ़ के नज़ारों के साथ। अगर थकान इजाज़त दे, तो ये छोटा एक्सटेंशन ज़रूर कीजिए।

आस-पास और क्या देखें

शांगढ़ मीडोज़ और शांगचुल महादेव मंदिर, बड़शांगढ़ वॉटरफ़ॉल, और ख़ुद ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क का इको ज़ोन — ये सब इसी वैली में, थोड़ी दूरी पर हैं। एक-दो दिन निकाल पाएँ तो पूरी सैंज वैली, अपने देओरी, शांशर और रैला जैसे गाँवों के साथ, घूमने लायक़ है।

और घूमते रहिए क्यूँकि जगहों, लोगों और शायद ख़ुद को जानने का इससे बेहतर तरीक़ा और नहीं।

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