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बगोरी — हर्षिल घाटी का वो गाँव जो कभी रेशम मार्ग का पड़ाव था

Sunrise view from a campsite in Uttarakhand’s Harshil Valley
बगोरी गाँव, हर्षिल घाटी - कभी नेलांग-जादुंग होकर तिब्बत जाने वाले काफ़िलों का पड़ाव, आज बुनकरों का गाँव।

आपकी मुलाक़ात कराते हैं उत्तराखंड के एक छोटे से गाँव – बगोरी से। हमारी ‘हर्षिल वीकेंड ट्रिप’ के दौरान हम यहीं रुके थे।

बड़ी बहका देने वाली जगह है। यहाँ जाएँगे तो यहां से कहीं और जाने का मन ही नहीं करेगा। कभी चारों तरफ़ बर्फ़ और देवदार से टपी पड़ी गढ़वाल हिमालय की चोटियाँ आपको मोह लेंगी। तो कभी गाँव के बराबर से बहती जलनधारी खड धारा – जो आगे भागीरथी और फिर गंगा नदी में मिल जाती है, इतनी मिलनसार है कि आपको वहीं बिठा लेगी।

गाँव के लोग भी बिलकुल इसी नदी की तरह ही मिलनसार हैं – हमेशा ही मुस्कुराते दिखते हैं। आप उनकी तरफ़ देखेंगे तो तुरंत एक बड़ी मुस्कान के साथ आपका अभिवादन करेंगे। गाँव आपका स्वागत एंट्री पर बने मंदिर के लाल रंग और साथ में बनी मोनेस्ट्री के रंगबिरंगे झंडों से करता है।

कैंपिंग इन हर्षिल वैली
Morning in Harshil valley

और बता दें कि गढ़वाल हिमालय की गोद में बसा ग्राम पंचायत बगोरी एक आदर्श गाँव भी है। आदर्श मतलब साफ़-सुथरा और रहने के लिए ज़रूरी सभी सुविधाओं के साथ। गाँव के बराबर में हर्षिल कैंट ऐरिया है जहाँ पर मार्केट और टैक्सी स्टैंड है।

वैसे बगोरी एक छोटा सा गाँव है – नए-पुराने सब मिलाकर कुछ 150 घर हैं और उनमें रहने वाले क़रीब 500 लोग। फ़ीमेल की जनसंख्या मर्दों की तुलना में ज़्यादा है। लोग सीधे-सादे और मेहनती हैं। सेबों की ज़बरदस्त खेती करते हैं। खेती के अलावा लोग बुनकर भी हैं – दिन के ख़ाली समय में आपको सूत कातते दिख जाएँगे। ये नहीं तो कुछ ना कुछ काम तो ज़रूर करते दिख जाएँगे। ज़्यादातर लोग जाड़ भोटिया जनजाति से हैं। सभी घर लकड़ी और पत्थर से बने हैं और घरों के नीचे ही लोग अपने गाय-बकरी रखते हैं।

कभी यहाँ से गुज़रता था रेशम मार्ग – नेलांग और जादुंग होते हुए

तिब्बत से भारत आने वाला व्यापार मार्ग सदियों तक हिमालय की गोद से होकर गुज़रता रहा है। इसे लोग अक्सर “रेशम मार्ग” या सिल्क रूट की एक शाखा भी कहते हैं – वो पुराना रास्ता जिस पर काफ़िले ऊन, नमक, बोरेक्स, रेशम और तिब्बती चीज़ों को लाद कर मैदानी इलाक़ों की तरफ़ चला करते थे, और बदले में अनाज, गुड़, कपड़ा और दूसरा सामान लेकर लौटते थे। ये काफ़िले भागीरथी घाटी से होते हुए, गंगोत्री से आगे, नेलांग और जादुंग घाटियों को पार कर, त्सांगचोक-ला जैसे ऊंचे दर्रों के रास्ते तिब्बत में दाख़िल होते थे।

Harshil valley in Uttarkashi, Uttarakhand
Harshil Valley Landscape

नेलांग घाटी में आज भी गरतांग गली नाम की एक अनोखी लकड़ी की सीढ़ीनुमा रास्ता (rock-cut stairway) मौजूद है, जो कभी इसी व्यापार मार्ग की जान हुआ करता था – काफ़िले इसी सीढ़ी से होकर पहाड़ की खड़ी चट्टान पार करते थे। बगोरी इसी पूरे रास्ते पर पड़ने वाला एक अहम पड़ाव और रात बिताने की जगह था, जहां आगे ऊंचाई की तरफ़ बढ़ने से पहले काफ़िले रुका करते थे। आज़ादी से पहले तक ऑस्ट्रियाई पर्वतारोही हाइनरिष हैरर जैसे कई फ़िरंगी और तिब्बती व्यापारी इसी रास्ते से आते-जाते रहते थे।

जिस समुदाय के लोग आज बगोरी में बसे हैं, वो जाड़ भोटिया कहलाते हैं – मूल रूप से यही नेलांग और जादुंग घाटी के व्यापारी और चरवाहे थे, जो सदियों से भारत-तिब्बत व्यापार को अपने कंधों पर ढोते आए थे। 1962 में जब भारत-चीन युद्ध हुआ, तो सीमा पूरी तरह बंद कर दी गई। रातों-रात तिब्बत के साथ चलने वाला वो सारा व्यापार, जिस पर इन परिवारों की पूरी रोज़ी-रोटी टिकी थी, ठप्प पड़ गया। नेलांग-जादुंग के इन जाड़ भोटिया परिवारों को वहां से हटाकर बगोरी और डुंडा जैसे गाँवों में बसाया गया – बगोरी के ज़्यादातर लकड़ी के घर इसी दौर, यानी 1962 के बाद बने।

व्यापारी से बुनकर बनने का सफ़र

व्यापार बंद होने के बाद इन परिवारों के सामने सवाल था – अब गुज़ारा कैसे हो? जिस हुनर के साथ ये पीढ़ियों से जीते आए थे, उसी हुनर ने रास्ता दिखाया। भोटिया समुदाय भेड़-बकरी पालने और ऊन के काम में पहले से माहिर था, तो पुरुषों ने भेड़ पालना और चरवाही जारी रखी, और महिलाओं ने ऊन कातने-बुनने के इसी पुराने हुनर को अपनी नई पहचान बना लिया।

यही वजह है कि आज बगोरी की गलियों में आपको दिन के खाली समय में महिलाएं सूत कातती और ऊनी शॉल, कंबल, टोपी, मोज़े बुनती दिख जाएँगी। यहाँ की भेड़ों से मिलने वाली ऊन को ‘हर्षिल क्रॉस’ कहा जाता है, जो बहुत मुलायम भले न हो पर कंबल, ट्वीड और कालीन बनाने के लिए ख़ासतौर से जानी जाती है। रंगाई के लिए आज भी कई परिवार जंगली पौधों से बने प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करते हैं। बुना हुआ सामान गाँव में और उत्तरकाशी के बाज़ार में बेचा जाता है।

आज बगोरी में मुख्य रूप से तीन काम चलते हैं – सेब की बागवानी (जो यहाँ की सबसे बड़ी आमदनी का ज़रिया है), राजमा की खेती (हर्षिल का सफ़ेद राजमा दूर-दूर तक मशहूर है), और ऊन का काम – कतरना, धुनना, कातना और बुनना। कुछ परिवार आज भी भेड़ों के बड़े रेवड़ रखते हैं, तो कुछ बाहर से ऊन ख़रीदकर बुनाई करते हैं। गर्मियों में गाँव में रहने वाला यही समुदाय सर्दियों में नीचे डुंडा जैसे गर्म इलाक़ों में उतर आता है – यानी आज भी इनकी ज़िंदगी में मौसम के साथ ठिकाना बदलने की वो पुरानी घुमंतू आदत कहीं न कहीं ज़िंदा है।

Local home view from Bagori Village, हर्षिल
Bagori village local home

गाँव के भीतर आज भी हिंदू और बौद्ध, दोनों परंपराएं साथ-साथ जीवित हैं – एंट्री पर बने लाल देवता के मंदिर और उसके बराबर खड़ी त्सेछेन खाक्याब लिंग मोनेस्ट्री इसी दोहरी विरासत की गवाही देते हैं।

गाँव की अपनी भाषा – जाड़/रोंग्पा

बगोरी के जाड़ भोटिया लोगों की अपनी एक मातृभाषा भी है, जिसे जाड़ (Jad) या रोंग्पा, रोंगमा, रोंगबा जैसे नामों से भी जाना जाता है। तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार से जुड़ी यह भाषा तिब्बती भाषा से काफ़ी मिलती-जुलती है, और नेलांग-जादुंग से लेकर हिमाचल के किन्नौर तक फैले इलाक़ों की बोलियों से इसका गहरा नाता है। बोलचाल में यह आज भी घर-घर में सुनाई देती है, लेकिन बहुत कम बोलने वालों की वजह से यूनेस्को ने इसे भारत की लुप्तप्राय भाषाओं की सूची में शामिल किया है। गाँव के लोग आमतौर पर बहुभाषी हैं – अपनी जाड़ भाषा के साथ-साथ हिंदी और गढ़वाली भी सहजता से बोलते हैं, और लिखा-पढ़ी में हिंदी का ही इस्तेमाल होता है।

हिंदू और बौद्ध परंपराओं का साथ-साथ चलना

बगोरी की सबसे ख़ास बात यही है कि यहाँ हिंदू और बौद्ध धर्म कभी एक-दूसरे के आड़े नहीं आए, बल्कि एक ही जीवनशैली में घुल-मिल गए। जाड़ भोटिया मूल रूप से तिब्बती बौद्ध परंपरा से जुड़े रहे हैं, लेकिन सदियों से गढ़वाल के हिंदू समाज के साथ रहते-रहते इन्होंने हिंदू रीति-रिवाज़ों को भी उतनी ही आत्मीयता से अपना लिया।

Locals from the Bagori Village
Local women of the Bagori Village in Harshil Valley

हर साल अप्रैल में, गर्मियों के लिए बगोरी लौटने से पहले, यह समुदाय डुंडा में रिंगाली देवी की पूजा करता है – यह विशुद्ध हिंदू परंपरा है। वहीं साल के दूसरे छोर पर, तिब्बती बौद्ध नववर्ष ‘लोसार’ भी उतनी ही धूमधाम से मनाया जाता है, घरों की छतों पर रंगबिरंगी प्रार्थना पताकाएं (प्रेयर फ्लैग्स) लहराई जाती हैं। पुराने समय में धार्मिक अनुष्ठान और इलाज के लिए बौद्ध लामाओं को बुलाया जाता था, और आज भी गाँव में हिंदू और बौद्ध, दोनों तरह के त्योहार बड़े उत्साह से मनाए जाते हैं।

गाँव की एंट्री पर एक तरफ़ लाल देवता का हिंदू मंदिर और दूसरी तरफ़ त्सेछेन खाक्याब लिंग मोनेस्ट्री का खड़ा होना महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं, बल्कि इसी सह-अस्तित्व का प्रतीक है। यहाँ के लोग ख़ुद को तिब्बतियों से अलग, एक स्वतंत्र पहचान वाला समुदाय मानते हैं – जिसने दो अलग-अलग आस्थाओं को आपस में लड़ाया नहीं, बल्कि दोनों को अपने रोज़मर्रा जीवन का हिस्सा बना लिया।

बगोरी कैसे पहुँचें

– हवाई मार्ग से – सबसे नज़दीकी एयरपोर्ट देहरादून का जॉली ग्रांट एयरपोर्ट है, जो बगोरी से क़रीब 230-240 किलोमीटर दूर है। वहाँ से टैक्सी या बस लेकर उत्तरकाशी होते हुए हर्षिल-बगोरी पहुंचा जा सकता है।

– रेल मार्ग से – सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है, जो लगभग 215 किलोमीटर दूर पड़ता है। देहरादून स्टेशन भी एक विकल्प है। यहाँ से उत्तरकाशी के लिए बस या टैक्सी आसानी से मिल जाती है।

– सड़क मार्ग से – उत्तरकाशी से हर्षिल घाटी सिर्फ़ क़रीब 76 किलोमीटर दूर है, और हर्षिल से बगोरी गाँव मुश्किल से 1 किलोमीटर की दूरी पर, नदी पार पैदल पुल से जुड़ा है। दिल्ली से हर्षिल का पूरा सफ़र क़रीब 470-480 किलोमीटर का है और ऋषिकेश-चंबा-नई टिहरी-उत्तरकाशी होते हुए तय होता है। ध्यान रहे, गाँव के भीतर तक गाड़ी नहीं जाती – हर्षिल में गाड़ी छोड़कर पैदल या दोपहिया से ही बगोरी में दाख़िल हुआ जा सकता है, यही इसकी शांति का राज़ भी है।

Harshil Valley landscape view
A landscape from the Harshil Valley, Uttarakhand

आसपास घूमने की जगहें

  • हर्षिल गाँव – बगोरी से बस एक पुल की दूरी पर, सेब के बागानों और देवदार के जंगलों के बीच बसा गाँव, जो राज कपूर साब की फ़िल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ की शूटिंग के लिए भी जाना जाता है।
  • धराली – हर्षिल के पास बसा एक और खूबसूरत गाँव, जहां से गंगोत्री जाने वाला रास्ता भी गुज़रता है।
  • गंगोत्री धाम – बगोरी से क़रीब 25 किलोमीटर दूर, गंगा नदी का उद्गम स्थल और चार धामों में से एक।
  • मुखबा गाँव – सर्दियों में जब गंगोत्री मंदिर बंद होता है, तो माँ गंगा की डोली यहीं लाई जाती है।
  • वील्सन कॉटेज – फ़्रेडरिक विल्सन उर्फ़ ‘पहाड़ी विल्सन’ का ऐतिहासिक घर, हर्षिल की एक और दिलचस्प कहानी।
  • नेलांग वैली और गरतांग गली – वही पुराना व्यापार मार्ग जिस पर कभी तिब्बत के काफ़िले चला करते थे, आज परमिट लेकर एडवेंचर के शौक़ीन इसे एक्स्प्लोर करते हैं।
  • लामा टॉप – बगोरी से थोड़ी चढ़ाई करके पहुंचा जा सकने वाला व्यू पॉइंट, जहां से पूरी हर्षिल घाटी एक फ्रेम में समा जाती है।

हमारी माने तो एक वीकेंड ट्रिप का प्लान यहाँ ज़रूर जाएँ। जान पाएँगे कि नहीं वो तो पता नहीं पर जगह से दिल ज़रूर लगा आएँगे।

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